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MP प्रमोशन आरक्षण विवाद, हाईकोर्ट में आज फिर सुनवाई; सरकार की नई पॉलिसी पर उठे सवाल

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Published On: 16 September 2025

MP हाईकोर्ट में आज प्रमोशन में आरक्षण से जुड़े मामले की अहम सुनवाई होगी। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा की डिवीजन बेंच इस पर सुनवाई करेगी। इससे पहले हुई सुनवाई में राज्य सरकार ने अपना जवाब पेश किया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे अधूरा बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी।

सरकार ने मांगी थी राहत

पिछली सुनवाई में सरकार ने कोर्ट से नई प्रमोशन पॉलिसी लागू करने के लिए अंतरिम राहत मांगी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार से साफ कहा था कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक नई पॉलिसी लागू नहीं की जाएगी। इसके लिए सरकार से लिखित अंडरटेकिंग भी ली गई है।

याचिकाकर्ताओं की आपत्ति

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने अपने जवाब में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को नजरअंदाज कर दिया है। खासकर क्रीमी लेयर और क्वांटिफायबल डेटा जैसे मुद्दों पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया। उनका आरोप है कि सरकार बार-बार समय लेकर सिर्फ टालमटोल कर रही है।

लगाया यह आरोप

भोपाल निवासी डॉ. स्वाति तिवारी समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि साल 2002 के प्रमोशन नियमों को हाईकोर्ट पहले ही आरबी राय केस में रद्द कर चुका है। इसके बावजूद सरकार ने लगभग उसी नीति को नए नाम से फिर लागू कर दिया है। जबकि यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में अभी विचाराधीन है। ऐसे में सरकार का यह कदम असंवैधानिक है।

आदेश पर सवाल

याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ता अमोल श्रीवास्तव ने दलील दी कि जब सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है, तो सरकार प्रमोशन की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ा सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने बैकलॉग वैकेंसी और समयसीमा जैसे मुद्दों पर भी स्पष्टता नहीं दी है।

सरकार का पक्ष

सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने पिछली सुनवाई में दलील दी थी कि नई प्रमोशन पॉलिसी कर्मचारियों के हित में है और इससे सभी वर्गों को बराबर अवसर मिलेगा। उनका कहना था कि सरकार की ओर से दी गई मौखिक अंडरटेकिंग के कारण प्रमोशन फिलहाल रुका हुआ है, जिससे कई कर्मचारी प्रभावित हो रहे हैं।

अगली दिशा तय करेगी सुनवाई

आज की सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि हाईकोर्ट नई प्रमोशन पॉलिसी को लेकर क्या रुख अपनाता है। फिलहाल सरकार इसे लागू करने के लिए उत्सुक है, वहीं याचिकाकर्ता इसे असंवैधानिक बताकर रोकने पर अड़े हुए हैं। अब कोर्ट का फैसला ही तय करेगा कि प्रदेश के हजारों कर्मचारियों का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

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