MP हाईकोर्ट में आने वाले समय में न्यायिक व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी होती दिख रही है। जजों की संख्या को लेकर हालात ऐसे बन रहे हैं कि अगर समय रहते नए जजों की नियुक्ति नहीं हुई, तो अदालत की कार्यप्रणाली पर सीधा असर पड़ सकता है। खास बात यह है कि अगले एक साल के भीतर एक के बाद एक कई वरिष्ठ जज सेवानिवृत्त होने वाले हैं।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा 25 दिसंबर 2026 को सेवानिवृत्त होंगे। यही नहीं, इसी साल हाईकोर्ट के सात अन्य जज भी रिटायरमेंट की दहलीज पर हैं। इसका मतलब यह हुआ कि एक साथ आठ अनुभवी जजों की विदाई तय है, जो न्यायिक संतुलन के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है।
वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो हाईकोर्ट में जजों के कुल 53 स्वीकृत पद हैं, लेकिन फिलहाल केवल 42 जज ही पदस्थ हैं। यानी अभी से 11 पद खाली चल रहे हैं। यदि रिटायरमेंट के बाद नई नियुक्तियां नहीं होतीं, तो जजों की संख्या घटकर सिर्फ 35 रह जाएगी, जो प्रदेश जैसे बड़े राज्य के लिए बेहद कम मानी जाती है।
MP लंबित मामलों का पहाड़ बनती चुनौती
जजों की कमी का सबसे सीधा असर लंबित मामलों पर पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2025 तक हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों की संख्या 4 लाख 82 हजार 747 तक पहुंच चुकी है। हर दिन नए मामले जुड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें निपटाने वाले हाथ सीमित होते जा रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जजों की संख्या और घटी, तो मामलों के निपटारे की गति और धीमी हो जाएगी। इसका खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ेगा, जिन्हें पहले से ही वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है। जजों की कमी न्याय में देरी का सबसे बड़ा कारण बन सकती है।
कब-कब खाली होंगी कुर्सियां
आने वाले महीनों में जिन जजों का सेवानिवृत्त होना तय है, उनमें जस्टिस अनिल वर्मा (15 मार्च), जस्टिस हिरदेश (27 मई), जस्टिस बीके द्विवेदी (14 जून), जस्टिस विजय कुमार शुक्ला (27 जून), जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह (17 सितंबर) और जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल (8 नवंबर) शामिल हैं। इन सभी की विदाई से बेंच और कमजोर होगी। न्यायिक जानकारों का मानना है कि यदि केंद्र और कॉलेजियम स्तर पर नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी नहीं लाई गई, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। हाईकोर्ट की प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि रिटायरमेंट से पहले ही खाली पदों को भरने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि न्याय व्यवस्था पर बढ़ता दबाव कुछ हद तक कम किया जा सके।
