ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने मोटर दुर्घटना मामलों में पीड़ितों को राहत देने वाला महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी वाहन की बीमा पॉलिसी में मुफ्त सवारियों (ग्रैच्युटस पैसेंजर्स) का जोखिम कवर नहीं भी है, तब भी बीमा कंपनी मुआवजा देने से बच नहीं सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में बीमा कंपनी पहले पीड़ितों को निर्धारित मुआवजा अदा करेगी और बाद में वाहन मालिक से राशि की वसूली कर सकेगी।
न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया ने 5 फरवरी 2026 को पारित आदेश में चौथे मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, मुरैना द्वारा 11 अगस्त 2008 को दिए गए अवार्ड को बरकरार रखा। साथ ही बीमा कंपनी द्वारा दायर सभी सिविल रिवीजन और विविध अपीलों को खारिज कर दिया। बीमा कंपनी का तर्क था कि पॉलिसी में यात्रियों का जोखिम शामिल नहीं था, इसलिए उसे मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
ग्वालियर हाईकोर्ट का अहम फैसला
अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि मोटर दुर्घटना मामलों में पीड़ितों को समय पर राहत मिलना सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि बीमा पॉलिसी में कुछ शर्तों का उल्लंघन भी हुआ हो, तब भी तीसरे पक्ष के अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। इसी आधार पर अदालत ने ‘पे एंड रिकवर’ सिद्धांत लागू किया। इसके तहत बीमा कंपनी पहले मुआवजा अदा करेगी और बाद में वाहन मालिक से राशि की वसूली करेगी।
पीड़ितों को समय पर राहत का संदेश
हाईकोर्ट के इस फैसले को मोटर दुर्घटना पीड़ितों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अक्सर बीमा कंपनियां तकनीकी आधार पर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती हैं, जिससे मुआवजा मिलने में लंबा समय लग जाता है। इस आदेश से स्पष्ट संदेश गया है कि पीड़ितों के अधिकार सर्वोपरि हैं और उन्हें कानूनी जटिलताओं के कारण राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य के मामलों में भी मार्गदर्शक साबित होगा। इससे न केवल बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी तय होती है, बल्कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों को भी स्पष्ट दिशा मिलती है कि मुआवजा प्रक्रिया में देरी न हो।
