फुलेरा दूज
फाल्गुन माह में मनाई जाने वाली फुलेरा दूज का पर्व इस बार देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन में इस अवसर पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किए गए, जहां मंदिरों को फूलों से सजाया गया और भगवान की विशेष पूजा-अर्चना की गई। भक्तों ने फूलों की होली खेलकर इस दिन को उल्लासपूर्वक मनाया। खासतौर पर बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहां फूलों की वर्षा के बीच भजन-कीर्तन और आरती का आयोजन हुआ। मान्यता है कि फुलेरा दूज से ही होली उत्सव की शुरुआत हो जाती है, इसलिए लोग इस दिन प्रेम, आनंद और आध्यात्मिक वातावरण के साथ रंगों के त्योहार का स्वागत करते हैं।
महत्व
फुलेरा दूज का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है और इसे होली उत्सव की शुरुआत का शुभ संकेत माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से वृंदावन और मथुरा सहित कई स्थानों पर भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को फूलों से सजाया जाता है तथा फूलों की होली खेली जाती है। मान्यता है कि इस दिन बिना मुहूर्त के भी विवाह, सगाई और अन्य मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं, क्योंकि यह तिथि अत्यंत शुभ मानी जाती है। भक्त इस अवसर पर मंदिरों में पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि और दांपत्य जीवन की खुशहाली की कामना करते हैं।
पूजा विधि
- फुलेरा दूज का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और राधा जी की पूजा को समर्पित माना जाता है
- यह पर्व ब्रज क्षेत्र में बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
- इस दिन भक्त घर या मंदिर में सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थान को फूलों से सजाते हैं।
- इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित कर उन पर अबीर-गुलाल और सुगंधित पुष्प अर्पित किए जाते हैं।
- पूजा में धूप-दीप जलाकर मंत्र या भजन-कीर्तन किया जाता है और माखन-मिश्री, फल व मिठाई का भोग लगाया जाता है।
- मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि आती है और प्रेम संबंध मजबूत होते हैं।
- कई स्थानों पर मंदिरों में फूलों की होली खेली जाती है, इसलिए इसे रंगों के पर्व होली की शुरुआत भी माना जाता है।
- भक्त पूरे दिन व्रत रखकर शाम को आरती के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
