नई RTI रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग सालों से मृतक परिवारों और पीड़ितों के लिए राहत देने में असफल रही है। साल 2010 में भारत सरकार के भोपाल मंत्रालय समूह ने 272.75 करोड़ रुपये मेडिकल, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को दिए। आज तक 139 करोड़ रुपये बकाया हैं, जबकि खर्च दिखाए गए अधिकांश पैसों से प्रभावितों को कोई फायदा नहीं हुआ।
गैस पीड़ितों और उनके बच्चों के स्वास्थ्य सुधार के लिए 33 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे, लेकिन अस्पतालों की हालत दयनीय है। 2019-2021 में तीन अस्पतालों में बनाए गए मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर में एक भी बड़ी सर्जरी नहीं हुई। जिसका कारण सर्जन और एनेस्थीसियोलॉजिस्ट नहीं हैं।
सामाजिक पुनर्वास पर भी बर्बादी
दरअसल, सोनोग्राफी और TMT मशीनें प्रशिक्षित स्टाफ की कमी के कारण जमी हुई हैं। केंद्रीय ऑक्सीजन लाइनें बिना ICU वाले अस्पतालों में बनाई गईं। हॉस्पिटल कैंटीनें और वेटिंग एरिया बंद पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट मॉनिटरिंग कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार, 90% स्पेशलिस्ट और आधे से ज्यादा डॉक्टर पद खाली हैं। बता दें कि 2012 में सात योग केंद्र 3.63 करोड़ रुपये में बनाए गए। न कोई योग प्रशिक्षक नियुक्त किया गया, न कोई प्रोग्राम हुआ। अधिकांश केंद्र अब शादी हॉल बन गए हैं। 5 करोड़ रुपये सुलभ शौचालय और कूड़ेदान पर खर्च हुए, जिनका पीड़ितों की जरूरत से कोई लेना-देना नहीं। 500 से ज्यादा विधवाओं की पेंशन चार साल से रुकी हुई है।
विधवा कॉलोनी में बदहाल हालत
2014 में 5 करोड़ रुपये की मंजूरी के बाद भी कॉलोनी का सीवेज सिस्टम नहीं बना। मानसून में गंदा पानी घरों में घुसता है। नासरीन बी ने मामले को लेकर कहा कि 5 करोड़ खर्च करने के बावजूद कामयाब नहीं हो पाए। यह लालच का स्तर है।
आर्थिक पुनर्वास में घोटाला
साल 2011-2013 के बीच 22 एजेंसियों को 18.13 करोड़ रुपये दिए गए। RTI दस्तावेजों में खुलासा हुआ कि एक चौथाई नाम नकली, आधे से ज्यादा जॉब लेटर फर्जी और केवल 6% प्रशिक्षु ही स्टाइपेंड पाए। 94% भुगतान बेकार साबित हुआ।
अन्य बर्बाद योजनाएं
- CM स्वरोज़गार योजना (1 करोड़) में केवल 108 पीड़ितों को 1 लाख तक की सहायता मिली।
- पाइप्ड पानी दिया गया, लेकिन 80% लोग गंदा पानी पी रहे हैं।
- मार्केटिंग और HR सेल की योजनाएं केवल कागज पर ही रह गईं।
भोपाल गैस राहत विभाग ने ठेकेदारों और अफसरों को लाभ पहुंचाया, जबकि पीड़ितों का संवैधानिक और न्यायालय निर्देशित पुनर्वास ठंडे बस्ते में पड़ा। 272.75 करोड़ में से 139 करोड़ बकाया हैं और शेष राशि का उपयोग पारदर्शी तरीके से करना अब जरूरी है।
Special Report By Kishan Singh Rana
