भोपाल | मध्य प्रदेश सरकार ने बिजली चोरी, केबल चोरी और बिजली कंपनी कर्मचारियों पर बढ़ते हमलों को रोकने के लिए पहली बार अलग से ‘बिजली थाने’ खोलने का फैसला किया है। पहले चरण में छह बड़े शहरों इंदौर, उज्जैन, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और रीवा में इनकी शुरुआत होगी।
इन थानों में तैनात पुलिसकर्मी मौके पर जाकर जांच करेंगे, एफआईआर दर्ज करेंगे और केस डायरी भी तैयार करेंगे। अब तक बिजली कंपनियों को ऐसे मामलों में स्थानीय पुलिस की मदद लेनी पड़ती थी, लेकिन समय पर सहयोग न मिलने से कई बार कार्रवाई अटक जाती थी। नई व्यवस्था से बिजली कर्मचारियों की सुरक्षा भी बढ़ेगी और वसूली अभियान तेज हो सकेगा।
गुजरात मॉडल पर तैयार होगी व्यवस्था
ऊर्जा विभाग के प्रस्ताव को पिछले महीने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में मंजूरी दी गई। इससे पहले ऊर्जा मंत्री और बिजली कंपनी का प्रतिनिधि मंडल गुजरात जाकर वहां के बिजली थानों का अध्ययन कर चुका है।
मप्र पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने बताया कि इंदौर के पोलोग्राउंड मुख्यालय और उज्जैन के ज्योतिनगर मुख्यालय में पहले दो बिजली थाने बनाए जाएंगे। दोनों जगह स्थान चिह्नित कर दिए गए हैं और इन्हें तीन से चार महीने में शुरू करने का लक्ष्य है।
खर्च का पूरा खाका तैयार
एक बिजली थाना बनाने पर करीब 20 से 30 लाख रुपए की लागत आएगी, जबकि संचालन पर हर साल लगभग दो करोड़ रुपए खर्च होंगे। हर थाने में 10 सदस्यीय स्टाफ होगा – एक टीआई, दो एएसआई, पांच पुलिसकर्मी, एक डेटा ऑपरेटर और एक सहायक उप निरीक्षक। खास बात यह है कि इसमें पुरुष और महिला कर्मचारियों की संख्या बराबर रखने की योजना है।
लाइन लॉस और चोरी पर नजर
बिजली थानों का मकसद सिर्फ बिजली चोरी रोकना ही नहीं, बल्कि बकायेदारों से वसूली भी सख्ती से करना है। फिलहाल प्रदेश के पश्चिम क्षेत्र में लाइन लॉस 12.5 प्रतिशत है, जबकि मध्य क्षेत्र में यह 25.70 और पूर्वी क्षेत्र में 28.04 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इसमें चोरी का बड़ा हिस्सा शामिल है। सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था से इस पर प्रभावी रोक लगेगी।
