ग्राम बरखेड़ा बोंदर के किसान रामचरण कुशवाह कभी धान, गेहूं और सोयाबीन जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे। सीमित जमीन, बढ़ती लागत और मौसम की मार के चलते आमदनी बेहद कम रह जाती थी। खेती से परिवार का खर्च निकालना भी चुनौती बन गया था। ऐसे हालात में उन्होंने खेती को छोड़ने के बजाय उसे बदलने का फैसला लिया।
खेती में बदलाव की शुरुआत तब हुई, जब उन्हें उद्यानिकी विभाग की एकीकृत बागवानी विकास योजना की जानकारी मिली। राष्ट्रीय विकास परियोजना के तहत इस योजना का लाभ लेकर उन्होंने एक एकड़ जमीन में फूलों और फलों की खेती शुरू की। यह फैसला उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
पारंपरिक खेती
रामचरण कुशवाह ने एक एकड़ भूमि में गुलाब, जरबेरा, गेंदा और संतरे की खेती की। करीब 5000 पौधों का रोपण किया गया। सिंचाई के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम अपनाया गया, जिस पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी भी मिली। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक पद्धति ने उत्पादन की तस्वीर पूरी तरह बदल दी।
खेती शुरू करने के महज एक साल के भीतर ही नतीजे सामने आने लगे। रोजाना 1500 से 2000 फूलों का उत्पादन होने लगा, जिन्हें स्थानीय और आसपास के बाजारों में आसानी से बेचा जाने लगा। फूलों के साथ फलों की खेती ने भी आमदनी को स्थिर आधार दिया।
लाखों की मासिक आमदनी
आज हालात यह हैं कि रामचरण कुशवाह प्रतिदिन 5 से 6 हजार रुपये तक कमा रहे हैं। उनकी मासिक आमदनी 2 से 3 लाख रुपये तक पहुंच गई है। पारंपरिक खेती के मुकाबले यह कई गुना अधिक है, जिससे न सिर्फ आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ा है। रामचरण कुशवाह मानते हैं कि सही जानकारी, तकनीक और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर खेती को मुनाफे का व्यवसाय बनाया जा सकता है। उनकी सफलता अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है और कई किसान बागवानी की ओर रुख करने लगे हैं।
यह कहानी बताती है कि खेती सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि समझदारी से किया जाए तो एक सफल व्यवसाय भी बन सकती है। जरूरत है तो बस सोच बदलने, सही मार्गदर्शन अपनाने और आधुनिक तरीकों को अपनाने की।
