भोपाल जिला अदालत में बुधवार को यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) और उसके आठ दोषी अधिकारियों के खिलाफ लंबित आपराधिक अपील की सुनवाई को लेकर अहम फैसला हुआ। अदालत ने साफ कर दिया कि अब मामले को अनिश्चितकाल तक टालना संभव नहीं है। इसी के साथ 23 दिसंबर को अंतिम सुनवाई की तारीख तय कर दी गई।
यह वही केस है, जो 2 और 3 दिसंबर 1984 को भोपाल में हुए दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक हादसों में से एक यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी से जुड़ा हुआ है। अदालत ने यूसीआईएल और भारतीय अधिकारियों से कहा है कि वे निर्धारित तारीख को अपनी अंतिम दलीलें पेश करने की तैयारी रखें। अदालत ने निर्देश दिया कि 23 दिसंबर को अंतिम सुनवाई अवश्य होगी और दोनों पक्ष अपने-अपने जवाब तैयार रखेंगे।
सुनवाई के दौरान अभियोजन ने आग्रह किया था कि मामले को आगे बढ़ाया जाए, जबकि बचाव पक्ष की ओर से सुनवाई की तारीख आगे खिसकाने की कोशिश की गई। लेकिन जिला न्यायाधीश ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि इतने लंबे समय से लंबित मामले में अब और देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
हाई कोर्ट में हलचल
दूसरी ओर, यूनियन कार्बाइड के छोड़े गए खतरनाक कचरे से संबंधित एक और गंभीर मुद्दे पर बुधवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। यह 900 मीट्रिक टन विषैली राख है, जिसका सुरक्षित निपटान पिछले कई वर्षों से विवाद में फंसा हुआ है। राज्य सरकार के गैस राहत विभाग ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर 8 अक्टूबर 2025 के उस आदेश को रद्द करने की मांग की, जिसमें अदालत ने सरकार को राख के निपटान के लिए नया, वैकल्पिक स्थान खोजने के निर्देश दिए थे। सरकार का तर्क है कि वैकल्पिक स्थान ढूंढने और वहां निपटान की व्यवस्था करना न तो आसान है और न ही तुरंत संभव। इस मुद्दे पर आज न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की खंडपीठ के सामने बहस हुई।
आगे बढ़ा मामला
एक ओर आपराधिक अपील की अंतिम सुनवाई की तारीख तय हो गई, दूसरी ओर विषैली राख के निपटान को लेकर भी कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। दोनों ही मामले भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों, पर्यावरण और न्याय प्रक्रिया से सीधे जुड़े हैं। अब 23 दिसंबर की सुनवाई और हाई कोर्ट के आगामी आदेश एक बार फिर इस बहुचर्चित त्रासदी से जुड़े मामलों की दिशा तय करेंगे।
