भोपाल के रवींद्र भवन में शुक्रवार शाम एक अलग ही माहौल देखने को मिला। मौका था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य की नई पुस्तक ‘हम और यह विश्व’ के विमोचन का। कार्यक्रम में पहुंचे पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने मंच से ऐसा संबोधन दिया, जिसने सभागार का पूरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया। धनखड़ ने शुरुआत से ही स्पष्ट कर दिया कि वे अपने अनुभवों और आज के दौर की चुनौतियों पर बेबाकी से बोलने आए हैं। उन्होंने कहा कि लगातार गलत नैरेटिव खड़ा करने वालों से निपटने के लिए उन्होंने एक फैसला लिया है, “मैंने विचार-विमर्श के बाद तय किया कि आगे से मैं अंग्रेज़ी में संबोधन करूंगा। जो समझना ही नहीं चाहते और बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं, उन्हें मेरे शब्दों का असल मतलब कभी समझ नहीं आएगा, क्योंकि मैं उनकी पसंद की भाषा में बात ही नहीं करूंगा।”
उन्होंने आगे कहा, “भगवान करे कोई भी नैरेटिव के चक्कर में न फंसे। मैं अपना उदाहरण नहीं दे रहा, पर आज कई लोगों को गलत कहानी बनाकर उसका शिकार बनाया जा रहा है। व्यक्तिगत रूप से लड़ाई संभव नहीं, लेकिन संस्थाएं लड़ सकती हैं। राष्ट्र के कॉन्सेप्ट को कुछ लोगों ने बहुत सीमित करके पेश किया है।”
निष्क्रियता पर भी कटाक्ष
संबोधन के दौरान धनखड़ ने समाज और राजनीति में फैली निष्क्रियता पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा, “जो सोया हुआ है, उसे आप जगा सकते हैं। पर जो जागकर भी सोया हो, उसे कोई नहीं जगा सकता। चाहे बल प्रयोग ही क्यों न कर लो।” उनके बोलते समय सहयोगी ने फ्लाइट का समय याद दिलाया, इस पर वे मुस्कुराते हुए बोले, “मैं विमान पकड़ने की चिंता में अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकता।” दर्शकों ने इस पर तालियों से स्वागत किया।
बेवजह के विरोध
कार्यक्रम में डॉ. मनमोहन वैद्य ने धनखड़ का परिचय देते हुए उन्हें अपना अभिभावक कहा। वैद्य ने बताया कि संघ पर होने वाले “बेवजह के विरोध” ने ही उन्हें लेखन की ओर प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि जब संघ के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी को आमंत्रित किया गया था, तब अनावश्यक विरोध की बाढ़ आ गई थी, “उसी घटना ने मेरे भीतर लिखने की इच्छा जगाई।”
कार्यक्रम में वृंदावन के श्री आनंदम धाम आश्रम के पीठाधीश्वर ऋतेश्वर महाराज और वरिष्ठ पत्रकार विष्णु त्रिपाठी विशेष अतिथि के रूप में मौजूद थे। उपराष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद यह जगदीप धनखड़ का पहला बड़ा सार्वजनिक संबोधन था, जिसमें उन्होंने एक बार फिर अपने स्पष्ट और दो-टूक अंदाज़ से यह संदेश दे दिया कि वे आगे भी मुखर रहेंगे और किसी नैरेटिव के दबाव में नहीं आएंगे।
