सतना और मैहर जिलों में नरवाई जलाने पर प्रतिबंध के बावजूद खेतों में आग लगाने की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। सैटेलाइट मैपिंग के जरिए 14 दिसंबर 2025 तक दोनों जिलों में कुल 1145 स्थानों पर नरवाई जलाने की घटनाएं सामने आई हैं। यह स्थिति पर्यावरण सुरक्षा को लेकर प्रशासन की चिंता बढ़ाने वाली है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने धान और गेहूं की कटाई के बाद फसल अवशेष जलाने पर पूरी तरह रोक लगा रखी है। इसी के तहत सतना के कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी डॉ. सतीश कुमार एस और मैहर की कलेक्टर रानी बाटड ने जिले में सख्त प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए हैं। सभी अनुविभागीय दंडाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि आगजनी की हर घटना पर तत्काल कार्रवाई करते हुए दोषियों पर जुर्माना लगाया जाए और पंचनामा तैयार किया जाए।
जुर्माने की व्यवस्था लागू
प्रशासन ने नरवाई जलाने वालों के लिए पर्यावरण क्षतिपूर्ति की राशि भी तय कर दी है। दो एकड़ से कम भूमि वाले किसानों पर प्रति घटना 2500 रुपए, दो से पांच एकड़ तक भूमि रखने वालों पर 5000 रुपए और पांच एकड़ से अधिक भूमि वाले कृषकों पर 15 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा। इसके साथ ही जरूरत पड़ने पर दंडात्मक कार्रवाई भी की जाएगी।
उप संचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास आशीष पाण्डेय के अनुसार, सतना जिले के विभिन्न अनुविभागों में बड़ी संख्या में नरवाई जलाने की घटनाएं दर्ज हुई हैं। इनमें रामपुर बघेलान में 261, नागौद में 206, उचेहरा में 155, कोटर में 108 और रघुराजनगर में 96 घटनाएं सामने आई हैं। इसके अलावा बिरसिंहपुर में 48, कोठी में 46 और मझगवां में 11 स्थानों पर खेतों में आग लगाने के मामले दर्ज किए गए हैं।
मैहर की भी चिंताजनक स्थिति
मैहर जिले में भी हालात कम गंभीर नहीं हैं। यहां अमरपाटन तहसील में 94, मैहर में 102 और रामनगर में 18 स्थानों पर नरवाई जलाने की घटनाएं सैटेलाइट के जरिए रिकॉर्ड की गई हैं। प्रशासन का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है।
प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि वे नरवाई जलाने से बचें और फसल अवशेष प्रबंधन के वैकल्पिक तरीकों को अपनाएं। अधिकारियों ने साफ किया है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली इस प्रवृत्ति पर अब और सख्ती की जाएगी। आने वाले दिनों में निगरानी और कार्रवाई दोनों तेज होंगी, ताकि खेतों में आग लगने की घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके।
