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सिकमी सत्यापन की भूलभुलैया में फंसे सतना के किसान, सिस्टम की चूक ने बढ़ाई मुसीबत

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Published On: 4 January 2026

सतना जिले में धान के सिकमी किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सरकारी सिस्टम की लापरवाही और आपसी तालमेल की कमी के कारण हजारों किसान आज असमंजस की स्थिति में खड़े हैं। जिन किसानों ने तय प्रक्रिया के तहत सिकमी सत्यापन और पंजीयन कराया, वही अब फूड ऑफिस में अटकी फाइलों के कारण परेशान हो रहे हैं। किसानों का कहना है कि उन्होंने स्टाम्प पेपर पर नोटरी से सत्यापन कराया। इसके बाद पटवारी प्रतिवेदन के आधार पर धान का पंजीयन किया गया। पंजीयन के बाद तहसील कार्यालय से भी सिकमी सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की गई। यानी, दस्तावेजों की जांच कई स्तरों से होकर गुजरी, फिर भी आज उन्हीं कागजों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

अब जब धान उपार्जन और भुगतान की बारी आई, तो फूड ऑफिस में सिकमी सत्यापन को लेकर पेंच फंस गया। अधिकारियों का तर्क है कि दस्तावेजों की कंप्यूटर अपलोडिंग में गड़बड़ी हुई है। इसी आधार पर कई किसानों के पंजीयन पर रोक लगा दी गई है, जिससे उनकी उपज की बिक्री और भुगतान दोनों अटक गए हैं।

सतना में कंप्यूटर ऑपरेटरों पर ठीकरा

इस पूरे मामले में जिम्मेदारी संविदा कंप्यूटर ऑपरेटरों पर डाली जा रही है। आरोप है कि ऑपरेटरों ने दस्तावेजों को कंप्यूटर सिस्टम में गलत तरीके से अपलोड किया। कार्रवाई के नाम पर कुछ संविदा कंप्यूटर ऑपरेटरों को सेवा से पृथक कर दिया गया, लेकिन इसे महज खानापूर्ति बताया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल सिस्टम पर
किसानों और स्थानीय जानकारों का सवाल साफ है कि अगर दस्तावेज कंप्यूटर में गलत अपलोड किए गए थे, तो फिर तहसील कार्यालय स्तर पर सिकमी सत्यापन कैसे हो गया? क्या तहसीलदार कार्यालय ने बिना सही जांच के सत्यापन कर दिया, या अब फूड ऑफिस अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है? इस प्रशासनिक खींचतान का सबसे बड़ा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। जिन किसानों ने कर्ज लेकर खेती की, वे अब धान बेचने और भुगतान मिलने का इंतजार कर रहे हैं। कई किसानों का कहना है कि अगर समय पर समाधान नहीं हुआ तो उनकी आर्थिक स्थिति और बिगड़ जाएगी।

जवाबदेही तय करने की मांग

किसान संगठनों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि केवल संविदा कर्मचारियों पर कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक सिस्टम की खामियों और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सतना के सिकमी किसान इसी तरह सरकारी लापरवाही का शिकार होते रहेंगे।

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