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मानसिक स्वास्थ्य की चुपचाप बढ़ती महामारी, समय पर मदद न मिलना बन रहा जानलेवा

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Published On: 10 October 2025

अक्सर लोग कहते हैं, “वो बस तनाव (मानसिक स्वास्थ्य) में है, थोड़ा वक्त दो, ठीक हो जाएगा।” लेकिन कभी-कभी यही कुछ मिनट जिंदगी और मौत के बीच की दूरी तय करते हैं। गांधी मेडिकल कॉलेज की मानसिक रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी बताती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य संकट समय नहीं देखता। “हमें ऐसी प्रणाली चाहिए, जहां रात 2 बजे भी मदद मिल सके,” वह कहती हैं।

आंकड़े बताते हैं कि हर तीन मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है। ज्यादातर लोगों को कभी मानसिक उपचार नहीं मिला। डॉ. सोनी के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य संकट उतना ही खतरनाक है जितना अचानक हार्ट अटैक। फर्क सिर्फ इतना है कि शरीर चीखता है और मन चुप रहता है।

केस 1

शाहपुरा की 24 वर्षीय छात्रा को परीक्षा से पहले गंभीर घबराहट होती थी। परिवार ने इसे सामान्य तनाव माना। एक दिन क्लास में बेहोश होने पर उसका रक्तचाप और श्वसन दर खतरनाक स्तर पर पहुंच गई। समय पर अस्पताल पहुंचने और प्रारंभिक उपचार के बाद उसे मानसिक रोग विभाग में दाखिल किया गया। वर्तमान में हबीदिया अस्पताल में उसका काउंसलिंग चल रहा है।

केस 2

कोलार की एक बैंक अधिकारी ने अचानक कहा, “अब मुझसे नहीं होगा।” पत्नी ने देखा कि पति ने कई नींद की गोलियां खा ली हैं। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। यह उदाहरण बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट में हर मिनट की देरी जानलेवा हो सकती है।

हर जिले में जरूरी व्यवस्थाएं

  • 24×7 साइकेट्रिक इमरजेंसी यूनिट का निर्माण।
  • डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिक्स को संकट प्रबंधन का प्रशिक्षण।
  • दूरस्थ क्षेत्रों के लिए टेली-साइकेट्री सेवाओं का विस्तार।
  • स्कूल और कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य फर्स्ट एड ट्रेनिंग।
  • मानसिक स्वास्थ्य की इमरजेंसी क्या है?

डॉ. सोनी के अनुसार, यह तब होती है जब किसी व्यक्ति के विचार, व्यवहार या भावनाएं खुद के या दूसरों के लिए खतरा बन जाएं।

  • आत्महत्या का प्रयास या बार-बार आत्मघाती विचार
  • पैनिक अटैक और अत्यधिक घबराहट
  • हिंसक या आक्रामक व्यवहार
  • नशा छोड़ने के बाद दौरे या भ्रम
  • अवसाद या मानसिक संतुलन खो देना
  • इमरजेंसी मदद प्रणाली की कमजोरियां
  • बहुत कम अस्पतालों में 24×7 इमरजेंसी यूनिट
  • जिला और छोटे शहरों में प्रशिक्षित मानसिक चिकित्सक की भारी कमी
  • de-escalation रूम की सुविधा का अभाव
  • मरीजों को रेफर करना पड़ता है, समय गंवता है
  • परिवार को ही संकट संभालना पड़ता है

डॉ. सोनी कहती हैं, “सही समय पर मदद मिलना ही जान बचाने में अहम है। मानसिक स्वास्थ्य की इमरजेंसी में देरी मौत के साथ खिलवाड़ कर सकती है।”

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