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फाइलों में 6 हजार पेड़, जमीन पर 14 एकड़ जंगल! भोपाल के मस्तीपुरा में खुला बड़ा पर्यावरणीय राज

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Published On: 28 December 2025

भोपाल की ईटखेड़ी सड़क पंचायत के मस्तीपुरा गांव में जो सामने आया, उसने सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी सच्चाई के फर्क को उजागर कर दिया। जिन फाइलों में महज 6 हजार पेड़ों का जिक्र था, वहां जांच के दौरान पूरा 14 एकड़ का जंगल मौजूद मिला। यह खुलासा तब हुआ, जब शिकायत के बाद प्रशासनिक अमला मौके पर पहुंचा और जमीन की हकीकत अपनी आंखों से देखी।

इस पूरे मामले की शुरुआत जिला पंचायत उपाध्यक्ष मोहन सिंह जाट की शिकायत से हुई। उन्होंने कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह को बताया कि मस्तीपुरा के खसरा नंबर-2 पर कोपरा और मुरम उत्खनन के लिए लीज दी गई है, जबकि वहां बड़ी संख्या में सागौन और अन्य कीमती पेड़ खड़े हैं। शिकायत में आशंका जताई गई कि अगर खनन हुआ तो पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।

प्रधानमंत्री के अभियान का हवाला

शिकायत में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का भी जिक्र किया गया। कहा गया कि जब देशभर में पेड़ लगाने का संदेश दिया जा रहा है, उसी समय भोपाल के पास हरे-भरे जंगल को उजाड़ने की तैयारी हो रही है। यह विरोधाभास न केवल पर्यावरण, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन पर लीज दी गई, उसके लिए ग्राम पंचायत की ग्राम सभा में कोई प्रस्ताव तक पारित नहीं हुआ। इसके बावजूद खनन की अनुमति दे दी गई। गांववालों का साफ कहना है कि यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे सामूहिक जन आंदोलन शुरू करेंगे, जो लीज निरस्त होने तक जारी रहेगा।

जांच में सामने आई अनदेखी

शिकायत के बाद शनिवार को वन, खनिज, राजस्व, पर्यावरण और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त टीम गांव पहुंची। मौके पर पेड़ों की गिनती और क्षेत्र का निरीक्षण किया गया। जांच में यह साफ हुआ कि बैरसिया विधानसभा क्षेत्र के इस गांव में नियमों को दरकिनार कर मुरम-कोपरा खदान की मंजूरी दी गई थी। 14 एकड़ जंगल मिलने के बाद लीज देने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रशासनिक हलकों में अब इस अनुमति की वैधता पर मंथन शुरू हो गया है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर लीज रद्द होगी और जंगल को बचाया जाएगा।

मस्तीपुरा का मामला सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं है। यह उस संघर्ष का प्रतीक बन गया है, जहां विकास के नाम पर खनन और पर्यावरण संरक्षण आमने-सामने खड़े हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन जंगल के पक्ष में खड़ा होता है या फाइलों की कहानी जमीन की सच्चाई पर भारी पड़ जाती है।

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