भोपाल | इस साल गणेश उत्सव को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए “माटी गणेश सिद्ध गणेश अभियान” के तहत खास पहल की गई है। इसके अंतर्गत शहर और ग्रामीण क्षेत्रों के अलग-अलग स्कूलों व सामाजिक संस्थानों में विद्यार्थियों और लोगों को मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाने का प्रशिक्षण दिया गया।
कई स्थानों पर आयोजित
यह प्रशिक्षण भोपाल के कई स्थानों पर आयोजित हुआ। इनमें सरस्वती विद्या मंदिर शारदा विहार, शासकीय नवीन उत्कृष्ट माध्यमिक विद्यालय नरेला शंकरी, ज्ञानदीप शिक्षा एवं चिकित्सा समिति मनीषा मार्केट, जन माध्यम संस्था भवानी कैंपस नरेला और झूलेलाल मंदिर संत हिरदाराम नगर शामिल रहे। वहीं बैरसिया विकासखंड में भी कई स्कूलों जैसे शासकीय माध्यमिक शाला कलारा, शासकीय माध्यमिक शाला सोनकच्छ, मांटेसरी पब्लिक स्कूल, शासकीय माध्यमिक शाला सुनगा और रैंकर्स पब्लिक स्कूल बैरसिया में इस तरह की कार्यशालाएं आयोजित की गईं।
विसर्जन
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को सिर्फ प्रतिमा बनाना ही नहीं सिखाया गया, बल्कि उन्हें यह भी बताया गया कि गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किस तरह किया जाए ताकि प्रकृति को नुकसान न पहुंचे। खासतौर पर यह समझाया गया कि प्लास्टर ऑफ पेरिस और केमिकल युक्त रंगों से बनी मूर्तियों के कारण नदियों और तालाबों का पानी दूषित होता है। इसके बजाय घर पर मिट्टी से बनी प्रतिमाओं का विसर्जन करना ज्यादा सुरक्षित और धार्मिक दृष्टि से भी सही माना जाता है।
#माटी_गणेश_सिद्ध_गणेश अभियान
इस बार हर घर विराजेंगे इको-फ्रेंडली गजानन
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महिलाओं हेतु सुरक्षित पर्यटन स्थल परियोजना अंतर्गत 23 से 25 अगस्त 2025 तक शासकीय कमला राजा कन्या महाविद्यालय, #ग्वालियर में “माटी गणेश – सिद्ध गणेश” कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है।
#JansamparkMP pic.twitter.com/HWjsbR7noz— Department of Tourism, MP (@tourismdeptmp) August 24, 2025
इन लोगों का रहा सहयोग
इस अभियान में मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद की प्रस्फुटन समितियों के सदस्यों का सहयोग रहा। इसके साथ ही नवांकुर संस्था, परामर्शदाता, सीएमसीएलडीपी के विद्यार्थी, कई शैक्षणिक संस्थान और सामाजिक संगठनों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। इन सबके प्रयास से बड़ी संख्या में बच्चों, युवाओं और आम नागरिकों ने मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाना सीखा।
अभियान का मुख्य उद्देश्य यही है कि लोग पर्यावरण संरक्षण के साथ धार्मिक आस्था को भी बनाए रखें। मिट्टी से बनी प्रतिमाएं आसानी से पानी में घुल जाती हैं और जलस्रोतों को प्रदूषित नहीं करतीं। इस कारण आने वाले समय में यह पहल और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।
