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जेसी मिल भूमि विवाद: ग्वालियर हाईकोर्ट से यूको बैंक को झटका, हस्तक्षेप याचिका वापस लेने से इनकार

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Published On: 5 February 2026

ग्वालियर हाईकोर्ट ने जेसी मिल की भूमि को शासकीय भूमि के रूप में दर्ज किए जाने से जुड़े मामले में यूको बैंक को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने बैंक की हस्तक्षेप याचिका को वापस लेने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल एक बैंक तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कई अन्य पक्षकारों और हितधारकों के अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकरण में जनहित का पहलू जुड़ा हुआ है, इसलिए याचिका को इस स्तर पर वापस लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यूको बैंक संभवतः 28 जनवरी 2026 के आदेश में उठाए गए सवालों से बचने के लिए याचिका वापस लेना चाहता था, जो न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

ग्वालियर हाईकोर्ट

अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष यह स्पष्ट नहीं कर सका कि जेसी मिल की किन-किन जमीनों को शासकीय भूमि घोषित किया गया है। साथ ही यह भी साफ नहीं हो पाया कि जिन नामांतरण प्रविष्टियों का हवाला दिया जा रहा है, वे स्वामित्व का प्रमाण हैं या केवल राजस्व रिकॉर्ड का हिस्सा।

हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि नामांतरण किसी भी स्थिति में स्वामित्व का दस्तावेज नहीं होता। इसके बावजूद कस्टोडियन विभाग के नाम दर्ज प्रविष्टियों के आधार पर भूमि पर अधिकार जताने की कोशिश की गई। कोर्ट ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट इस मुद्दे पर पहले ही कई फैसलों में स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं।

सुरक्षित ऋणदाता होने की दलील

यूको बैंक की ओर से यह दलील दी गई कि वह जेसी मिल का सुरक्षित ऋणदाता है। यदि मिल की जमीन को शासकीय घोषित कर दिया गया, तो बैंक के लिए बकाया राशि की वसूली लगभग असंभव हो जाएगी। बैंक ने यह भी कहा कि यदि उसकी याचिका स्वीकार होती है, तो मामला फिर से समिति के पास जाएगा और आगे की कार्रवाई समिति की सिफारिशों पर निर्भर होगी।

श्रमिकों के अधिकारों पर बहस

सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि जेसी मिल के श्रमिकों का अधिकार पहले होना चाहिए या ऋणदाताओं का। इस पर अदालत ने फिलहाल कोई अंतिम राय नहीं दी और संबंधित पक्ष को अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज पेश करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि 10 दिनों के भीतर विस्तृत आधिकारिक जवाब दाखिल किया जाए। यूको बैंक को कवरिंग लेटर या ई-मेल के जरिए संबंधित रिकॉर्ड भी पेश करने होंगे। मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी को तय की गई है। कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि आधिकारिक परिसमापक ने पत्र केवल यूको बैंक को ही क्यों भेजा और अन्य वैकल्पिक कानूनी रास्तों का उपयोग क्यों नहीं किया गया।

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