MP में बीते कुछ वर्षों से जजों पर हो रहे हमलों ने आखिरकार हाईकोर्ट को कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार को हुई सुनवाई में राज्य सरकार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि जजों की सुरक्षा को लेकर हालात बेहद चिंताजनक हैं। कोर्ट ने सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई की तारीख 4 दिसंबर तय की है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा, “जब जजों को ही सुरक्षा मांगनी पड़ रही है, तो फिर आम नागरिकों की सुरक्षा की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यह साफ तौर पर लॉ एंड ऑर्डर की विफलता दिखाता है।” कोर्ट की यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
लगातार बढ़ती घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
मध्य प्रदेश में न्यायिक अधिकारियों पर हमले नई बात नहीं हैं। 2016 में मंदसौर में एक जज पर हमला हुआ था, जिसके बाद स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज की गई थी। इसके बाद बालाघाट में पदस्थ एक जज पर हमला और भोपाल गैस प्राधिकरण के पीठासीन अधिकारी पर एसिड अटैक जैसी गंभीर घटनाओं ने हालात और बिगाड़े हैं। हाल ही में दो जजों के घर चोरी, दो बार घर में घुसने की कोशिश और एक जिला जज पर हमला इन मामलों ने हाईकोर्ट को साफ संदेश दे दिया कि सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ कागजों में मजबूत दिखाई देती है, जमीन पर नहीं।
सरकार का जवाब
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली ने दावा किया कि राज्य के 52 जिला एवं सत्र न्यायालयों में बाउंड्रीवाल बनाकर सुरक्षा को पुख्ता किया गया है। उन्होंने कहा कि जिला स्तरीय निगरानी समितियों की रिपोर्ट के आधार पर लगातार सुधार किए जा रहे हैं, लेकिन चीफ जस्टिस इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखे। उन्होंने दो टूक कहा कि जिन हालिया घटनाओं का जिक्र हुआ है, उन्हें देखकर यह बिल्कुल नहीं लगता कि सुरक्षा व्यवस्था ठीक है, “यह तो साफ तौर पर व्यवस्था के पूरी तरह टूटने का संकेत है।”
हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश
हाईकोर्ट ने संकेत दिए हैं कि जजों की सुरक्षा को लेकर अब हल्की-फुल्की जवाबदारी नहीं चलेगी। अदालत ने कहा कि जिला स्तरीय निगरानी समितियों की रिपोर्टों पर सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए और सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर न्यायिक अधिकारी को सुरक्षित माहौल मिले। 4 दिसंबर की सुनवाई राज्य सरकार के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगी, क्योंकि कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा पर अब कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
