इस वर्ष होली पर्व को लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 2 मार्च की रात को होलिका दहन होगा, जबकि 3 मार्च की सुबह से खग्रास चंद्र ग्रहण का सूतक काल शुरू हो जाएगा। ज्योतिषाचार्य पंडित अमर डिब्बेवाला के अनुसार, 2 मार्च की शाम 5:55 बजे भद्रा काल प्रारंभ होगा, जो 3 मार्च की सुबह 4:28 बजे तक रहेगा। हालांकि, भद्रा काल में भी होलिका दहन किया जा सकता है। फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर होलिका पूजन का विशेष महत्व माना जाता है।
पंडित अमर डिब्बेवाला ने बताया कि इस वर्ष भद्रा भूलोक पर मानी जा रही है, जो सिंह राशि में स्थित है। ऐसे में प्रदोष काल में होलिका पूजन और दहन करना श्रेष्ठ रहेगा। इसका मुख्य उद्देश्य नकारात्मक ऊर्जा का नाश करना है। भद्रा काल में दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है और इससे व्यक्ति को मानसिक शांति और धार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
होली 2026
3 मार्च को धुलेंडी के दिन खग्रास चंद्र ग्रहण रहेगा। ग्रहण दोपहर 3:19 बजे से शाम 6:47 बजे तक रहेगा। ग्रहण समाप्त होने से लगभग 12 घंटे पहले सूतक काल प्रारंभ हो जाएगा। इस दौरान आमतौर पर शुभ कार्य और मंदिरों में दर्शन वर्जित माने जाते हैं। इस कारण लोगों के मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि ग्रहण काल में होली कैसे मनाई जाए।
ग्रहण में सुरक्षित होली
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, ग्रहण के दिन केवल गुलाल या सूखे रंग से ही होली खेली जा सकती है। जल का प्रयोग या किसी प्रकार के भौतिक आयोजन से बचना चाहिए। सूतक काल में सावधानी और शास्त्रीय नियमों का पालन करने से पर्व की परंपरा और धार्मिक मान्यताएं सुरक्षित रहती हैं। इस ग्रहण को उदित चंद्र ग्रहण माना गया है और लगभग 17 मिनट तक यह खग्रास स्थिति में रहेगा। इस समय इष्ट देव या गुरु मंत्र की माला जाप करने से मंत्र सिद्धि का लाभ मिलता है। पंडित डिब्बेवाला के अनुसार यह समय साधना और मानसिक ध्यान के लिए अत्यंत फलदायी है।
इस वर्ष होली पर्व की शुरुआत होलिका दहन से होगी और धुलेंडी पर खग्रास चंद्र ग्रहण के कारण सावधानीपूर्वक पर्व मनाने की सलाह दी गई है। शास्त्रीय नियमों का पालन और सूखी रंगों का प्रयोग इस अवसर को सुरक्षित और शुभ बनाएगा।
