इंदौर | मध्य प्रदेश के इंदौर में आईडीए (इंदौर विकास प्राधिकरण) की बड़ी लापरवाही और प्रशासनिक अनदेखी का मामला सामने आया है। हुकुमाखेड़ी स्थित करीब 3.043 हेक्टेयर जमीन, जिसकी मौजूदा बाजार कीमत लगभग 5 करोड़ रुपए बताई जा रही है, पिछले 35 सालों में कई बार खरीदी-बेची गई और इस पर लगातार अवैध निर्माण भी होते रहे।
कैसे हुआ विवाद
यह जमीन स्कीम 97/4 (खसरा नंबर 40) की है। 1991 में आईडीए ने इस पर कब्जा करने का फैसला लिया था, ताकि यहां आवासीय विकास और एक रीजनल पार्क बनाया जा सके। लेकिन तत्कालीन अधिकारियों की लापरवाही से कब्जा 2002 में लिया गया और 2005 में ही इसे आईडीए के नाम दर्ज कराया गया। इस बीच जमीन बार-बार बिकी और उस पर मकान, दुकानें, गोदाम और वेयरहाउस जैसे अवैध निर्माण खड़े हो गए।
CAT अधिकारियों की खरीद
इस जमीन का कुछ हिस्सा 1994 से 2002 के बीच राजा रमन्ना प्रौद्योगिक केंद्र (CAT) के कुछ वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने भी खरीदा। उस समय CAT में आवासीय सुविधाएं सीमित थीं, इसलिए अधिकारियों-कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से मूल किसानों से प्लॉट लेकर बांट लिए। इसी से आगे चलकर विवाद और अतिक्रमण की स्थिति बनी।
शिकायत और कार्रवाई
दो महीने पहले, CAT के वैज्ञानिक राजवीर सिंह और अन्य कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री और प्रशासन को लिखित शिकायत भेजी कि जमीन पर अवैध कब्जा लगातार बढ़ रहा है। इसके बाद आईडीए ने भू-अर्जन अधिकारी के जरिए राऊ एसडीएम को पत्र लिखकर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए। लेकिन अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
अधिकारियों की सफाई
भू-अर्जन अधिकारी सुदीप मीणा का कहना है कि यह मामला काफी पुराना है और लंबे समय तक कोर्ट में चला। 2022 में हाई कोर्ट का फैसला आईडीए के पक्ष में आया है। अब जमीन पर नई योजना बनाई जा रही है और अतिक्रमण हटाने के लिए एसडीएम और इंजीनियरों को निरीक्षण के निर्देश दिए गए हैं।
प्रभावित लोग और जिम्मेदारी
इस मामले में करीब 500 लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं, जिनमें से लगभग 40 लोगों ने सीधे इस जमीन पर प्लॉट खरीदे हैं। प्रभावित वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने वैधानिक स्थिति स्पष्ट करने के लिए आईडीए को पत्र लिखा था, लेकिन जवाब में यही बताया गया कि जमीन आईडीए की है और यहां रीजनल पार्क बनाने की प्रक्रिया चल रही है।
फिलहाल, इस पूरे मामले में शासन-प्रशासन और आईडीए दोनों की लापरवाही उजागर हुई है, क्योंकि समय रहते कब्जा नहीं लिया गया और अवैध निर्माण जारी रहे। अब सवाल यह है कि इतने सालों बाद अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कितनी प्रभावी हो पाएगी।
