भोपाल | केंद्र सरकार द्वारा लाए गए ऑनलाइन गेमिंग (प्रमोशन एंड रेगुलेशन) बिल 2025 को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह बिल अब कानून बन चुका है, लेकिन इसके खिलाफ मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। रीवा के पुष्पेंद्र सिंह, जो क्लबूबम 11 स्पोर्ट्स एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ हैं, ने कहा है कि यह कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और पूरे उद्योग को संकट में डाल देगा।
हाईकोर्ट में सुनवाई
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई की और इसे अगले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध किया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि केंद्र सरकार ने 22 अगस्त को जो कानून लागू किया है, वह स्किल-बेस्ड और चांस-बेस्ड गेम्स में कोई अंतर नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पहले ही रमी, पोकर और फेंटेसी स्पोर्ट्स जैसे गेम्स को कौशल-आधारित खेल मान चुके हैं, इसके बावजूद इन पर भी रोक लगाना संविधान के खिलाफ है।
नए कानून के प्रावधान
नए कानून के तहत, किसी भी रियल-मनी गेम को ऑफर करना, चलाना या उसका प्रचार करना अपराध माना गया है। इसका उल्लंघन करने वालों को तीन साल तक की जेल और एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। विज्ञापन चलाने वालों पर भी दो साल की जेल और 50 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि, ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेम्स जैसे पबजी और फ्री फायर को बढ़ावा देने का प्रावधान रखा गया है।
इंडस्ट्री पर असर
इस कानून का असर तुरंत दिखाई देने लगा है। ड्रीम11, गेम्स24×7, विंजो और गेम्सक्राफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों ने अपने मनी-बेस्ड गेम्स बंद कर दिए हैं। ड्रीम11 ने 22 अगस्त को कैश-बेस्ड गेम्स रोकने की घोषणा की, जबकि गेम्सक्राफ्ट ने रमीकल्चर और गेम प्ले सर्विसेज जैसे प्लेटफॉर्म्स बंद कर दिए। पोकरबाजी ने भी अपने ऑपरेशंस स्थगित कर दिए हैं।
याचिकाकर्ता के तर्क
पुष्पेंद्र सिंह का कहना है कि इस कानून से न केवल उद्योग को आर्थिक नुकसान होगा बल्कि लाखों नौकरियां भी खतरे में पड़ जाएंगी। साथ ही, बैन के कारण खिलाड़ी अवैध ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स की ओर आकर्षित होंगे, जहां कोई रेगुलेशन नहीं होता। उनका कहना है कि सरकार को चांस-बेस्ड और स्किल-बेस्ड गेम्स में फर्क करते हुए केवल सट्टेबाजी जैसे खेलों पर रोक लगानी चाहिए, न कि पूरे उद्योग को खत्म करना चाहिए।
इस मामले पर अगली सुनवाई में हाईकोर्ट यह तय करेगा कि केंद्र सरकार का नया कानून संविधान की कसौटी पर कितना खरा उतरता है।
