मध्य प्रदेश में जहरीले कफ सिरप से हुई बच्चों की मौतों के बाद अब औषधि प्रशासन पूरी तरह सक्रिय हो गया है। इंदौर में रोजाना अलग-अलग फार्मा कंपनियों के कफ सिरप के सैंपल लिए जा रहे हैं। प्रशासन की टीमों के साथ ड्रग इंस्पेक्टर दवा बाजार, भंवरकुआ और देवास नाका जैसे प्रमुख इलाकों में जांच कर रहे हैं। लेकिन इस सख्ती के बीच एक पुराना और बेहद गंभीर मामला फिर चर्चा में आ गया है, जो कि 2018 का फेंटानाइल हाइड्रोक्लोराइड ड्रग फैक्ट्री कांड है।
छह साल पहले डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) ने इंदौर के पोलोग्राउंड स्थित आर्या फार्मेसी के परिसर में छापा मारकर घातक नशीले ड्रग फेंटानाइल हाइड्रोक्लोराइड का अवैध उत्पादन पकड़ा था।
DRI के अनुसार, फैक्ट्री से 11 किलो ड्रग बरामद हुआ था, जिसकी कीमत 100 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई थी। ड्रग का नेटवर्क भारत से लेकर अमेरिकी देशों तक फैला हुआ था। इस केस में डॉ. मोहम्मद सिद्दिकी, मनु गुप्ता और मेक्सिकन नागरिक जार्ज सालिक को गिरफ्तार किया गया था।
अवैध यूनिट
जांच के दौरान खुलासा हुआ कि जिस परिसर में ड्रग तैयार हो रहा था, वह जमीन जिला उद्योग केंद्र (DIC) ने आर्या फार्मेसी को लीज पर दी थी। नियमों के मुताबिक, ऐसी जमीन किसी और को किराए या साझेदारी में नहीं दी जा सकती।
इसके बावजूद यहां अवैध फैक्ट्री चलती रही, और डीआईसी व डीआरआई दोनों ने उस वक्त कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की।
बाद में केवल औपचारिक नोटिस जारी हुआ, लेकिन मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया।
फाइलों पर धूल
2018 के बाद से विभाग में लगातार अधिकारी बदलते रहे। संतोष त्रिवेदी, अजय सिंह चौहान, संध्या बामनिया और एसएस मंडलाई के बाद अब स्वप्निग गर्ग जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। गर्ग का कहना है कि उन्हें पुराने मामले की जानकारी नहीं है, लेकिन अब यदि फैक्ट्री या लीज से जुड़ी कोई गड़बड़ी पाई गई तो नोटिस जारी कर कार्रवाई की जाएगी।
केस के मुख्य आरोपी जार्ज सालिक को NDPS एक्ट के तहत 20 साल की सजा सुनाई जा चुकी है।
उसके पिता जार्ज रेनन सॉलिस फर्नांडीज पिछले साल जनसुनवाई में बेटे की रिहाई की गुहार लगा चुके हैं। उन्होंने DRI अधिकारियों पर 4 करोड़ रुपए रिश्वत मांगने के आरोप भी लगाए थे।
अब फिर उठ रहे सवाल
कफ सिरप कांड और पुराना फेंटानाइल केस दोनों ही घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि दवा निर्माण और नियंत्रण व्यवस्था में गंभीर कमियां हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि नियामक तंत्र की विफलता है। अब सवाल यह है कि क्या 2018 जैसी चूकें फिर दोहराई जा रही हैं और क्या औषधि प्रशासन सच में सुधार की दिशा में आगे बढ़ेगा या फिर यह मामला भी पुराने फाइलों की तरह ठंडा पड़ जाएगा?
