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जबलपुर केंद्रीय जेल में दिवाली, 70 कैदियों को पैरोल पर रिहा; परिवार संग मनाई खुशियां

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Published On: 21 October 2025

दिवाली का त्योहार इस बार जबलपुर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस केंद्रीय जेल में बंद कैदियों के लिए भी खुशियों का पैगाम लेकर आया। जेल प्रशासन ने दीपावली के मौके पर 70 कैदियों को पैरोल पर रिहा किया, ताकि वे अपने परिवार के साथ त्योहार की रौनक और मिठास महसूस कर सकें। जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर ने बताया कि पैरोल उन्हीं कैदियों को दी गई है, जिनका जेल में आचरण अच्छा रहा और जिनके खिलाफ किसी भी तरह की अनुशासनहीनता या शिकायत दर्ज नहीं है।

जेल प्रशासन ने साफ किया कि पैरोल की अवधि कानूनी नियमों और मानकों के अनुसार तय की गई है। पैरोल प्राप्त कैदी कुछ दिन अपने परिवार के साथ रहेंगे और तय समय पर उन्हें वापस जेल लौटना होगा। अधीक्षक अखिलेश तोमर ने बताया कि पैरोल देने से पहले सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं, और संबंधित थाना पुलिस को भी इसकी सूचना दी जाती है।

परिवार संग मनाई खुशियां

इस अवसर ने कैदियों और उनके परिवारों के चेहरे पर खुशी और भावनाओं की लहर दौड़ा दी। कई कैदी वर्षों बाद अपने घरों में दिवाली की रोशनी और खुशियों का अनुभव कर पा रहे थे। सोमवार शाम को 70 कैदी अपने घरों के लिए रवाना हुए, उनकी मुस्कान और उत्साह देखते ही बन रहा था।

आवेदन और चयन प्रक्रिया

इस साल दिवाली, होली और ईद जैसे प्रमुख त्योहारों के लिए कुल 80 से अधिक कैदियों ने पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन सुरक्षा मानक और पात्रता नियमों के आधार पर केवल 70 कैदियों को मंजूरी दी गई। जेल प्रशासन ने बताया कि यह संख्या हमेशा सुरक्षा और अनुशासन को ध्यान में रखकर तय की जाती है।

थानों को भेजी गई सूची

जेल प्रशासन ने पैरोल प्राप्त कैदियों की अलग सूची तैयार कर संबंधित थानों को भेज दी है। अधीक्षक ने चेतावनी दी कि यदि कोई कैदी पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसकी रिहाई रद्द कर दी जाएगी और भविष्य में उसे पैरोल की सुविधा नहीं मिलेगी। पैरोल की खबर मिलते ही कैदियों और उनके परिजनों के चेहरे खिल उठे। कई लोग अपने घर जाकर अपने बच्चों और बुजुर्गों के साथ त्योहार मनाने के लिए बेहद उत्साहित दिखे। परिवार के साथ मिलकर दीयों की रोशनी में खुशी मनाने वाले कैदियों ने बताया कि यह अवसर उनके लिए भावनाओं से भरा और यादगार है।

जेल प्रशासन के अनुसार, पैरोल का उद्देश्य सिर्फ कैदियों को छुट्टी देना नहीं है, बल्कि यह एक मौका है कि वे समाज और परिवार के साथ जुड़ाव महसूस करें, अपने आचरण में सुधार करें और भविष्य में सुधारात्मक जीवन की ओर कदम बढ़ाएं।

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