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महिला सुरक्षा के नाम पर करोड़ों की वसूली! परिवहन विभाग की वीएलटीडी योजना पर उठे गंभीर सवाल

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Published On: 25 October 2025

महिलाओं और स्कूली बच्चों की सुरक्षा के नाम पर शुरू की गई “व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD)” और “पैनिक बटन” योजना अब विवादों में घिर गई है। कांग्रेस प्रवक्ता संतोष सिंह परिहार ने इस योजना में बड़े घोटाले का आरोप लगाते हुए राज्य और केंद्र सरकार दोनों को कठघरे में खड़ा किया है। परिहार ने बताया कि साल 2020 में निर्भया फंड के तहत शुरू हुई यह योजना सिर्फ फाइलों तक सिमट कर रह गई है। बीएसएनएल को कमांड और कंट्रोल सेंटर की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन पांच साल गुजरने के बाद भी प्रदेश में यह सेंटर ठीक से शुरू नहीं हुए। न तो पर्याप्त तकनीकी स्टाफ है और न ही जरूरी सॉफ्टवेयर पूरी तरह काम कर रहे हैं।

डिवाइस सप्लायर कंपनियों पर पक्षपात के आरोप

VLTD निर्माता अटलांटा कंपनी (नरूला एंड कंपनी) पर दो बार टेस्ट में फेल होने के बावजूद उसे लिस्टेड करने के आरोप लगे हैं। परिहार का कहना है कि विभाग के कुछ अफसर और एक “खास व्यक्ति” की दखलंदाजी से नियमों की अनदेखी की जा रही है। बीएसएनएल और उसकी सब-एजेंसी सेंसराइज को बिना एग्रीमेंट के वर्क ऑर्डर जारी कर दिया गया। इसके बावजूद प्रदेशभर में डिवाइस की बिक्री और वसूली चालू रही, जो सीधा भ्रष्टाचार का मामला बनता है।

वाहन मालिकों की जेब पर डाका

  • परिहार ने बताया कि वेबसाइट पर जिस डिवाइस की कीमत ₹8,200 बताई गई है, वही ₹10,000 से ₹11,000 तक बेची जा रही है।
  • नए वाहनों पर तो ₹12,000 से ₹16,000 तक वसूले जा रहे हैं।
  • इतना ही नहीं, सालाना मेंटेनेंस शुल्क जो ₹1,416 तय था, उसकी जगह ₹3,700 से ₹9,000 तक वसूला जा रहा है।
  • उन्होंने कहा कि प्रत्येक डिवाइस पर ₹3,000 की उगाही का खुलासा खुद एक स्टिंग ऑपरेशन में हो चुका है।

सुरक्षा फीचर बने मज़ाक

  • कांग्रेस प्रवक्ता ने बताया कि कमांड सेंटरों पर ताले लटके हैं, शिकायत करने के लिए कोई पोर्टल या हेल्पलाइन तक मौजूद नहीं।
  • मोबाइल ऐप में जो हाई-स्पीड अलर्ट या जियोफेंसिंग जैसे फीचर दिखाए जा रहे हैं, वो केवल नाम के लिए हैं।
  • ज्यादातर जिलों में सर्विस सेंटर भी गायब हैं।

उच्चस्तरीय जांच की मांग

संतोष सिंह परिहार ने कहा कि यह मामला सिर्फ आर्थिक गड़बड़ी का नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। उन्होंने ईडी, सीबीआई और सीवीसी से स्वत: संज्ञान लेकर जांच की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया कि कितने वाहनों में पैनिक बटन वास्तव में काम कर रहे हैं? अटलांटा जैसी कंपनी को अनुमति कैसे मिली? विभागीय वेबसाइट पर झूठे डीलरों के नाम क्यों डाले गए? और नरूला नामक व्यक्ति का विभाग में इतना दबदबा आखिर क्यों?

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