सतना जिले के पिथौराबाद में बुधवार को आयोजित जैव विविधता कृषि प्रक्षेत्र दिवस किसानों के लिए खास रहा। यहां एक ही जगह पर देशी धान की करीब 200 किस्में प्रदर्शित की गईं। इस मौके पर कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में परंपरागत धान की किस्मों को संरक्षित रखना अपने आप में मिसाल है। उन्होंने कहा कि यह न सिर्फ किसानों के लिए, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों के लिए भी प्रेरणा का बड़ा स्रोत है।
कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार ने कार्यक्रम में किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर किसान पारंपरिक खेती को फिर से अपनाएं, तो वे कम लागत में अधिक लाभ कमा सकते हैं। उन्होंने कहा कि रासायनिक खाद और महंगे बीजों पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को अपने पुराने देशी बीजों को दोबारा जीवन देना चाहिए।
पारंपरिक बीजों के प्रचार-प्रसार पर जोर
कलेक्टर ने मौके पर मौजूद कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इन पारंपरिक बीजों के प्रचार-प्रसार पर जोर दें, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान इनके फायदों को समझ सकें। कार्यक्रम में जैव विविधता प्रबंधन समिति के अध्यक्ष पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि देशी अनाज, सब्जियों और धान की किस्मों को बचाना अब वक्त की जरूरत है। उन्होंने बताया कि वे वर्षों से इन बीजों के संरक्षण और प्रचार के लिए काम कर रहे हैं।
दाहिया ने कहा, “अगर किसान अपनी पुरानी खेती की परंपरा को अपनाएंगे, तो मिट्टी भी जिंदा रहेगी और आमदनी भी बढ़ेगी।” उन्होंने जैव विविधता को खेती की आत्मा बताते हुए कहा कि हर गांव में बीज बैंक बनाने की जरूरत है।
200 धान की दुर्लभ किस्मों का खेत
कार्यक्रम के दौरान कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस, कृषि अधिकारी और वैज्ञानिक खेतों में पहुंचे। वहां उन्होंने धान की 200 अलग-अलग देशी किस्में देखीं, जिनमें सुगंधित, लंबे दाने वाली और पारंपरिक किस्में शामिल थीं। अधिकारी भी इन किस्मों को देखकर हैरान रह गए। इसके अलावा, कलेक्टर ने स्थानीय बीज बैंक और पुराने कृषि यंत्रों के संग्रहालय का भी निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि यह पहल खेती के प्रति जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभाएगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती की परंपरा को जिंदा रखेगी।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसान, कृषि वैज्ञानिक और अधिकारी मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि इस तरह के आयोजन न सिर्फ ज्ञान बढ़ाते हैं, बल्कि खेती में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी बड़ा कदम हैं।
