मैहर जिले के नादन वृत्त में पदस्थ बाबू देवेंद्र सिंह का मामला एक बार फिर राजस्व विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जानकारी के मुताबिक तत्कालीन नायाब तहसीलदार ने एक गंभीर प्रकरण में बाबू को तीन दिन के भीतर जवाब पेश करने का नोटिस जारी किया था। हैरानी की बात यह है कि तीन साल बीत जाने के बावजूद न तो जवाब प्रस्तुत किया गया और न ही विभाग ने कोई ठोस कदम उठाया।
इस लापरवाही से परेशान होकर राम किशोर नामक व्यक्ति ने आयुक्त, रीवा के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। शिकायत पर आयुक्त ने मामले की जांच के निर्देश कलेक्टर मैहर को जारी किए। यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया। आरोप है कि आयुक्त का यह महत्वपूर्ण पत्र करीब सात से आठ महीने तक कलेक्टर कार्यालय में दबा रहा।
कलेक्टर कार्यालय पर उठे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आयुक्त स्तर का पत्र इतने लंबे समय तक कार्यालय में कैसे रुका। क्या यह महज प्रशासनिक सुस्ती थी या जानबूझकर की गई अनदेखी? अब जबकि मामला सामने आया है, तब कलेक्टर ने एसडीएम मैहर को जांच के निर्देश दिए हैं। लेकिन इस देरी ने पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि जांच कहीं औपचारिकता बनकर न रह जाए। अक्सर देखा जाता है कि गंभीर मामलों की जांच भी तहसीलदार या पटवारी स्तर पर सौंप दी जाती है, जबकि वरिष्ठ अधिकारी खुद जिम्मेदारी लेने से बचते नजर आते हैं। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि क्या इस बार भी सच्चाई तक पहुंचा जाएगा या मामला कागजों में सिमट जाएगा।
कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने साफ मांग की है कि आयुक्त का पत्र दबाकर रखने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो मामला इतना लंबा नहीं खिंचता। अब सवाल यह भी है कि जिन लोगों की वजह से जांच में महीनों की देरी हुई, उन पर कब कार्रवाई होगी। इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्व विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आम लोगों के बीच यह संदेश जा रहा है कि शिकायतें ऊपर तक पहुंचने के बावजूद फाइलों में दब जाती हैं। यदि आयुक्त के निर्देश भी महीनों तक अमल में नहीं लाए जाते, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करें।
