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डॉक्टर का कोट और बच्चों का डर! एक जांच में हाई BP, 3 जांच में निकला सच

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Published On: 29 December 2025

डॉक्टर के सामने पहुंचते ही कई बच्चों का ब्लड प्रेशर (BP) अचानक बढ़ जाना अब सिर्फ आशंका नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्य बन चुका है। एम्स भोपाल सहित देश-विदेश के मेडिकल संस्थानों की संयुक्त स्टडी में सामने आया है कि व्हाइट कोट फीयर यानी डॉक्टर और जांच का डर बीपी की रीडिंग बिगाड़ सकता है। इसका सीधा असर यह होता है कि बच्चे बेवजह हाई ब्लड प्रेशर के मरीज मान लिए जाते हैं।

स्टडी के मुताबिक, सिर्फ एक बार की जांच के आधार पर किसी किशोर को हाई बीपी घोषित करना गलत साबित हो सकता है। भोपाल के सरकारी और निजी स्कूलों के 800 से ज्यादा स्वस्थ बच्चों पर हुई जांच में पहली बार 4% बच्चों का बीपी ज्यादा मिला। जब वही जांच दोबारा हुई, तो आंकड़ा घटकर 2.7% और तीसरी जांच में 1.9% रह गया।

किशोरावस्था में बीपी क्यों बनता है खतरा

डॉक्टरों का कहना है कि अगर किशोरावस्था में ब्लड प्रेशर सच में ज्यादा है और उसे नजरअंदाज कर दिया जाए, तो आगे चलकर यह दिल, किडनी और यूरिन से जुड़ी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। इसी डर में कई माता-पिता बच्चों को समय से पहले दवाइयां शुरू करवा देते हैं, जो हमेशा जरूरी नहीं होतीं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्कूल का माहौल, परीक्षा का दबाव, डॉक्टर से घबराहट और अस्पताल की सेटिंग पहली रीडिंग को प्रभावित करती है। मेडिकल भाषा में इसे व्हाइट कोट इफेक्ट कहा जाता है। इसी कारण इस स्टडी में हर बच्चे का बीपी तीन अलग-अलग दिनों में और हर दिन तीन रीडिंग लेकर मापा गया।

10 से 18 साल के बच्चों पर गहन अध्ययन

यह रिसर्च भोपाल के शहरी इलाकों में जून से दिसंबर के बीच की गई। इसमें 10 से 18 साल के 824 छात्र-छात्राएं शामिल रहे। हर बच्चे की लंबाई, वजन और बीएमआई दर्ज किया गया ताकि मोटापा और बीपी के रिश्ते को समझा जा सके। हर छात्र को एक यूनिक कोड दिया गया, जिससे तीनों जांचों की तुलना संभव हो सकी। अध्ययन में चौंकाने वाली बात यह रही कि हाई ब्लड प्रेशर की समस्या लड़कों में ज्यादा पाई गई। लड़कों में यह दर करीब 2.6% रही, जबकि लड़कियों में सिर्फ 0.2%। डॉक्टर इसे हार्मोनल बदलाव, मानसिक दबाव और जीवनशैली से जोड़कर देख रहे हैं।

लोकेशन कुल स्टूडेंट्स मेल फीमेल
नॉर्थ भोपाल 161 80 81
साउथ भोपाल 158 76 82
ईस्ट भोपाल 157 76 81
वेस्ट भोपाल 164 29 135
सेंट्रल भोपाल 184 128 56

सामान्य वजन वाले बच्चे भी सुरक्षित नहीं

यह स्टडी उस धारणा को भी तोड़ती है कि हाई बीपी सिर्फ मोटे बच्चों को होता है। कई ऐसे बच्चे भी हाई बीपी की श्रेणी में आए जिनका वजन और बीएमआई पूरी तरह सामान्य था। यानी सिर्फ शरीर देखकर खतरे को नकारा नहीं जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल हेल्थ प्रोग्राम में एक बार की जगह बार-बार ब्लड प्रेशर जांच का प्रावधान होना चाहिए। साथ ही बच्चों में फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाने, स्क्रीन टाइम कम करने और तनाव प्रबंधन पर भी फोकस जरूरी है।

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