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2 गोली में ठीक होने वाली बीमारी अब हफ्तों में भी नहीं संभल रही, अस्पतालों में बढ़ता दवा फेल संकट

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Published On: 30 December 2025

अस्पतालों में एक खामोश खतरा तेजी से पांव पसार रहा है। आईसीयू में भर्ती गंभीर मरीज ही नहीं, बल्कि सामान्य संक्रमण से जूझ रहे मरीज भी सही इलाज के बावजूद जल्दी ठीक नहीं हो पा रहे हैं। डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह है कि एंटीबायोटिक दवाएं पहले जैसा असर नहीं दिखा रहीं। इस हालात की जड़ है एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी AMR। यह वह स्थिति है, जब बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीव दवाओं के सामने हार मानने के बजाय खुद को मजबूत बना लेते हैं। नतीजा यह होता है कि वही दवा, जो कभी कारगर थी, अब बेअसर हो जाती है।

प्रधानमंत्री ने हाल ही में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस खतरे की ओर देश का ध्यान दिलाया था। इसके बाद सोमवार को एम्स भोपाल में भी इस विषय पर गंभीर मंथन हुआ। डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने माना कि यह समस्या अब सिर्फ मेडिकल जर्नल तक सीमित नहीं, बल्कि अस्पतालों के रोजमर्रा के इलाज में दिख रही है।

डॉक्टरों की चेतावनी साफ

एम्स के निदेशक डॉ. माधवानंद कर ने बताया कि बिना सलाह एंटीबायोटिक लेना, गलत खुराक, अधूरा कोर्स और जरूरत से ज्यादा ताकतवर दवाओं का इस्तेमाल इस संकट को और बढ़ा रहा है। अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो निमोनिया और पेशाब के संक्रमण जैसी आम बीमारियां भी जानलेवा बन सकती हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, पहले जो बुखार या संक्रमण दो-तीन गोलियों में ठीक हो जाता था, अब उसी मरीज को ठीक होने में कई हफ्ते लग रहे हैं। मेरोपेनम, पेनिसिलिन और अमॉक्सीसिलिन जैसी दवाएं, जो कभी आईसीयू की रीढ़ मानी जाती थीं, अब कई मामलों में असर नहीं दिखा रहीं।

बेअसर दवाएं

दिलचस्प बात यह है कि कुछ ऐसी दवाएं, जिन्हें सालों पहले बेकार मान लिया गया था, अब दोबारा असर दिखाने लगी हैं। सेपटोन और क्लोरोफेनिकोल जैसी दवाओं की वापसी इसी बदले हालात की ओर इशारा करती है। एम्स भोपाल की ताजा रिसर्च ने स्थिति की गंभीरता साफ कर दी है। 3,330 मरीजों पर की गई जांच में सामने आया कि यूरिन, फेफड़े और खून के संक्रमण में इस्तेमाल होने वाली कई दवाएं तेजी से कमजोर हो रही हैं। ई.कोलाई पर सिप्रोफ्लॉक्सासिन का असर घटकर 39 प्रतिशत रह गया है।

डॉ. माधवानंद कर का कहना है कि अगर अभी जिम्मेदारी नहीं ली गई, तो आने वाला समय और डरावना होगा। AMR अब अस्पताल की दीवारों से बाहर निकलकर समाज के हर व्यक्ति को प्रभावित कर रहा है। सही समय पर दवा, सही मात्रा और पूरा कोर्स ही इस अदृश्य खतरे से बचाव का रास्ता है।

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