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मैहर के भटूरा के जंगलों पर खनन का हमला, खामोशी में दबता कानून

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Published On: 4 January 2026

मैहर जिले का भटूरा इलाका इन दिनों विकास नहीं, बल्कि अवैध खनन की आहट से पहचाना जा रहा है। जहां कभी हरियाली और सन्नाटा हुआ करता था, वहां अब धमाकों, खुदाई और भारी मशीनों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। जंगल की सीमाओं से सटे इलाकों में पत्थर निकालने का काम खुलेआम जारी है, जबकि कई स्थान ऐसे बताए जा रहे हैं जहां खदानों की न तो स्वीकृति है और न ही वैध माइनिंग प्लान।

स्थानीय स्तर पर दा मैहर स्टोन एंड लाइम कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और के के गौतम लाइम स्टोन कंपनी के नाम लगातार चर्चाओं में हैं। आरोप है कि इन कंपनियों की गतिविधियां जंगल से सटे क्षेत्रों तक फैल चुकी हैं। नियमों की अनदेखी कर विस्फोट और खुदाई की जा रही है, जिससे वन क्षेत्र को सीधा नुकसान पहुंच रहा है।

मैहर: विभागों की रहस्यमयी चुप्पी

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल संबंधित विभागों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। खनिज, वन, श्रम और पर्यावरण चारों विभागों की ओर से कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद निरीक्षण और कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह गई है। इस चुप्पी ने संदेह को और गहरा कर दिया है। भटूरा क्षेत्र में यह पहला मामला नहीं है। कुछ समय पहले जैन कंपनी की खदान में एक नाबालिग आदिवासी श्रमिक की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर दिया था। मामला सामने आने के बाद यह जरूर कहा गया कि नाबालिग से श्रम कराया जा रहा था, लेकिन आज तक खदान संचालक पर कोई सख्त कानूनी कार्रवाई नजर नहीं आई।

सवालों के घेरे में कानून

नाबालिग की मौत के बाद भी गैर-इरादतन हत्या जैसी गंभीर धाराएं न लगना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों में यह चर्चा आम है कि खनन माफिया का नेटवर्क इतना मजबूत है कि नियम-कायदों की धार कुंद हो चुकी है और जिम्मेदार महज मूकदर्शक बने हुए हैं। यदि अवैध खनन को लेकर उठ रही आशंकाएं गलत हैं, तो संबंधित विभागों के सामने स्थिति स्पष्ट करने का मौका है। भटूरा क्षेत्र में संचालित सभी खदानों की स्वीकृति, माइनिंग प्लान, पर्यावरणीय अनुमति और श्रम अनुपालन सार्वजनिक किए जाएं। इससे सच्चाई सामने आ सकेगी।

आज हालात यह हैं कि जंगल का सीना छलनी है और एक आदिवासी बच्चे की मौत फाइलों में दबती नजर आ रही है। यह केवल पर्यावरण या कानून का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की भी परीक्षा है। भटूरा की कहानी विकास की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है, जहां जंगल और इंसाफ दोनों अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

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