ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग को क्षेत्र के विकास की रीढ़ माना गया था, लेकिन यही परियोजना अब किसानों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गई है। भूमि अधिग्रहण के समय सरकार और रेलवे की ओर से जमीन के बदले नौकरी या मुआवजे का भरोसा दिया गया था। वर्षों बाद भी सैकड़ों किसान न नौकरी पा सके और न ही पूरा मुआवजा, जिससे उनका भविष्य अधर में लटक गया है। शुरुआत में रेलवे ने स्पष्ट कहा था कि जिन किसानों की जमीन ली जाएगी, उनके परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी। इसी भरोसे पर करीब 1400 लोग पात्रता की प्रक्रिया में शामिल हुए। बाद में नीति में बदलाव हुआ और रिश्तेदारों को भी जमीन में शामिल करने की बात सामने आई। इसी बदलाव के साथ नौकरी देने की प्रक्रिया लगभग ठप हो गई।
रेल परियोजना के शुरुआती चरण में चुनिंदा किसानों को नौकरी दी गई, लेकिन बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों को बाहर कर दिया गया। जिनको नौकरी नहीं मिली, उन्हें 5 लाख रुपये का विकल्प देने की बात कही गई, पर वह भुगतान भी अधिकांश मामलों में कागजों तक ही सीमित रह गया।
सिंगरौली- सतना के किसानों की अलग पीड़ा
सतना जिले में हालात और ज्यादा गंभीर हैं। सतना-रीवा दोहरीकरण और पन्ना रेल लाइन से प्रभावित किसानों ने 88 दिनों तक आंदोलन किया, फिर भी बिरहुली और सकरिया जैसे गांवों के किसान आज तक न नौकरी पा सके, न ही 5 लाख रुपये की राशि। अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे और किसान दफ्तरों के चक्कर काटते रहे।2019 के बाद जिन किसानों को नौकरी नहीं दी गई, उनके लिए 5 लाख रुपये देने के आदेश जारी हुए थे। बावजूद इसके, वर्षों बीत जाने के बाद भी भुगतान लंबित है। किसान पूछ रहे हैं कि जब आदेश हैं, तो अमल क्यों नहीं हो रहा।
पड़ोसी जिलों में तेजी
रीवा और सीधी जिलों में हालात बिल्कुल अलग नजर आते हैं। रीवा-सीधी-सिंगरौली रेल लाइन के तहत मुआवजा वितरण अपेक्षाकृत तेजी से हुआ और करोड़ों रुपये किसानों तक पहुंचे। इसके उलट सतना-रीवा प्रोजेक्ट में अब भी 709 लोगों को मुआवजा और 5 लाख की राशि मिलना बाकी है। सबसे ज्यादा नाराजगी इस बात को लेकर है कि सतना के सांसद और विधायक इस मुद्दे पर खुलकर सामने नहीं आ रहे। किसान संगठनों का कहना है कि ज्ञापन सौंपे जा रहे हैं, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही। यही वजह है कि एक बार फिर आंदोलन की चेतावनी दी जा रही है।
