MP की राजधानी भोपाल जल्द ही मेडिकल तकनीक के एक नए दौर में कदम रख सकती है। अगर प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है, तो भोपाल उन गिने-चुने शहरों में शामिल होगा, जहां शव का पोस्टमॉर्टम बिना चीरफाड़ के किया जाएगा। एम्स भोपाल में वर्चुअल ऑटोप्सी शुरू करने की दिशा में औपचारिक पहल हो चुकी है, जिससे पारंपरिक पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया पूरी तरह बदल सकती है।
सोमवार को एम्स भोपाल प्रबंधन ने भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी की बैठक में वर्चुअल ऑटोप्सी से जुड़ा विस्तृत प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव पहले ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से सैद्धांतिक मंजूरी पा चुका था। अब इसे वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधियों के सामने रखा गया है, जहां से बजट स्वीकृति की उम्मीद जताई जा रही है।
फंड मंजूरी की उम्मीद
भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने बताया कि बैठक में प्रस्ताव को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। उन्होंने कहा कि अगर सब कुछ तय प्रक्रिया के अनुसार हुआ, तो जल्द ही इस परियोजना के लिए फंड जारी किया जा सकता है। ऐसा होने पर एम्स भोपाल प्रदेश का पहला अस्पताल होगा, जहां वर्चुअल ऑटोप्सी की सुविधा उपलब्ध होगी। वर्चुअल ऑटोप्सी में शव की जांच अत्याधुनिक स्कैनिंग तकनीक से की जाती है। इसमें सीटी स्कैन, एमआरआई और 3डी इमेजिंग की मदद से मौत के कारणों का पता लगाया जाता है। जापान और कई विकसित देशों में यह तकनीक पहले से उपयोग में है। इसमें शरीर को काटे बिना अंदरूनी चोट, ब्लॉकेज या अन्य कारणों की स्पष्ट जानकारी मिल जाती है।
शोध में साबित हुई तकनीक की विश्वसनीयता
शिलॉन्ग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस के अध्ययन में सामने आया है कि फांसी के मामलों में वर्चुअल ऑटोप्सी और पारंपरिक पोस्टमॉर्टम के निष्कर्षों में करीब 90 प्रतिशत तक समानता पाई गई। इससे यह साफ होता है कि यह तकनीक न केवल आधुनिक है, बल्कि भरोसेमंद भी है। विशेषज्ञों के मुताबिक वर्चुअल ऑटोप्सी से तैयार रिपोर्ट डिजिटल एविडेंस के रूप में बेहद मजबूत होती है। मौत के कारण से जुड़ी नस, अंग या चोट की 3डी तस्वीरें अलग-अलग स्तरों पर उपलब्ध रहती हैं। इन डिजिटल रिकॉर्ड्स को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है।
परिजनों के विरोध से मिलेगी राहत
अक्सर धार्मिक या सामाजिक कारणों से परिजन शव की चीरफाड़ का विरोध करते हैं, जिससे अस्पताल और पुलिस को कठिन स्थिति का सामना करना पड़ता है। वर्चुअल ऑटोप्सी इस टकराव को खत्म कर सकती है। इसमें शव को बिना नुकसान पहुंचाए जांच पूरी होगी और परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए शरीर सही अवस्था में सौंपा जा सकेगा। अगर यह योजना जमीन पर उतरती है, तो भोपाल न सिर्फ प्रदेश बल्कि देश में फॉरेंसिक जांच के क्षेत्र में नई मिसाल कायम करेगा। यह तकनीक न्यायिक प्रक्रिया को भी तेज, पारदर्शी और अधिक वैज्ञानिक बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
