सतना के नए अंतरराज्यीय बस टर्मिनल (ISBT) को शहर की यात्री परिवहन व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था, लेकिन यहां से केवल आधी बसों के संचालन का निर्णय अब खुद व्यवस्था पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। प्रशासनिक स्तर पर लिए गए इस फैसले को परिवहन विशेषज्ञ तकनीकी रूप से गलत और नियमों के विपरीत बता रहे हैं। नतीजा यह है कि यात्रियों के साथ-साथ बस संचालकों को भी आर्थिक और व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
वर्तमान स्थिति यह है कि पन्ना, छतरपुर, रीवा और सीधी रूट की अधिकांश बसें अब भी पुराने बस स्टैंड से ही संचालित हो रही हैं। वहीं, ISBT से रीवा और सीधी की ओर जाने वाली बसों को यात्रियों के इंतजार में लंबा समय बिताना पड़ रहा है। दो अलग-अलग स्टैंड से संचालन होने के कारण यात्रियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है और नए ISBT की उपयोगिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
सतना में बढ़ीं तीर्थयात्रियों की मुश्किलें
मैहर और चित्रकूट जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं पर इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। अब उन्हें एक ही यात्रा के लिए पुराने बस स्टैंड और नए ISBT, दोनों के बीच भटकना पड़ रहा है। इससे न केवल समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी का अतिरिक्त किराया चुकाना भी उनकी मजबूरी बन गया है।
असमंजस में बस संचालक
केवल यात्री ही नहीं, बस संचालक भी इस आधे-अधूरे फैसले से परेशान हैं। अलग-अलग रूटों पर बसों को बांटने से परिचालन में तालमेल बैठाना मुश्किल हो गया है। कई संचालकों का कहना है कि यात्रियों की संख्या घटने से उनकी दैनिक आय पर सीधा असर पड़ रहा है और ईंधन व स्टाफ का खर्च निकालना भी चुनौती बनता जा रहा है।
ग्रामीण यात्रियों पर अतिरिक्त बोझ
ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले यात्रियों के लिए यह व्यवस्था और ज्यादा परेशानी वाली साबित हो रही है। उन्हें अलग-अलग गंतव्यों के लिए अलग-अलग बस स्टैंड पर जाना पड़ रहा है, जिससे उनका खर्च बढ़ रहा है। एक ही स्थान पर सभी बस सेवाएं उपलब्ध न होने से नए ISBT की मूल अवधारणा ही कमजोर होती दिख रही है।
एक स्वर में उठी मांग
यात्री, बस संचालक और परिवहन से जुड़े जानकार एकमत हैं कि सभी रूटों की बसों का संचालन पूरी तरह से नए ISBT से ही किया जाना चाहिए। इससे न केवल यात्रियों की समस्याएं खत्म होंगी, बल्कि शहर की यातायात व्यवस्था भी अधिक सुचारु हो सकेगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस निर्णय को अंततः लेना ही है, उसे अभी लागू करने में प्रशासन को क्या दिक्कत है। जल्दबाजी में लिया गया यह आधा-अधूरा फैसला फिलहाल नए ISBT के उद्देश्य को कमजोर कर रहा है। जरूरत है कि प्रशासन तत्काल पूर्ण संचालन का निर्णय लेकर व्यवस्था को पटरी पर लाए।
