MP में प्रशासनिक भ्रष्टाचार को लेकर एक कथित बयान ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। मुख्य सचिव के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान दिया गया कथित वक्तव्य कि कोई भी कलेक्टर बिना पैसे लिए काम नहीं करत अब प्रदेश की शासन-प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। इस बयान को लेकर सरकार की साख, प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है।
इस कथन को महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर आरोप के रूप में देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यदि यह बयान सत्य है, तो यह संकेत देता है कि जिला स्तर पर निर्णय, शिकायत निवारण, योजनाओं के क्रियान्वयन और सरकारी कार्यों में पैसों के आधार पर फैसले हो रहे हैं। यह स्थिति भ्रष्टाचार निवारण कानूनों के तहत जांच योग्य गंभीर विषय मानी जा रही है।
MP में संस्थागत भ्रष्टाचार पर उठे गंभीर सवाल
लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में 50% कमीशन को लेकर आरोप लगते रहे हैं, जिसे सत्तारूढ़ दल अब तक राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताता आया है। हालांकि, मुख्य सचिव के कथित बयान के बाद यह बहस फिर से तेज हो गई है कि क्या भ्रष्टाचार कुछ व्यक्तियों तक सीमित है या फिर यह एक व्यवस्थित नेटवर्क के रूप में काम कर रहा है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि जिला स्तर पर लेन-देन हो रहा है, तो वह राशि कहां तक पहुंचती है। राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का दावा है कि ऐसा नेटवर्क केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसमें राजनीतिक संरक्षण, बिचौलियों और प्रभावशाली तंत्र की भूमिका भी हो सकती है। जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि भ्रष्टाचार एक व्यापक और संगठित प्रणाली का रूप ले चुका है।
सरकार की भूमिका पर प्रश्न
आलोचकों का कहना है कि यह पूरा मामला प्रशासनिक नियंत्रण की कमजोरी और सरकार की विफलता को उजागर करता है। यदि जिला प्रशासन पर प्रभावी निगरानी नहीं है, तो शिकायत निवारण तंत्र, स्थानांतरण-पोस्टिंग प्रक्रिया और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर भी सवाल उठते हैं। इसे सुशासन के बजाय “वसूली-तंत्र” के रूप में देखा जा रहा है।
जवाबदेही की मांग
मामले को लेकर प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की गई है कि कथित बयान की सत्यता की पुष्टि की जाए, वीडियो रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए और पूरे प्रदेश में प्रशासनिक भ्रष्टाचार की स्वतंत्र जांच कराई जाए। साथ ही ठेका-पट्टा, भुगतान, अनुमति, योजनाओं और अधिकारियों की भूमिका की गहन समीक्षा की मांग भी उठाई गई है।
अब पूरे प्रदेश की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं क्या यह मामला केवल बयानबाजी तक सीमित रहेगा या वास्तव में किसी ठोस जांच और जवाबदेही की दिशा में आगे बढ़ेगा।
