हर साल 26 जनवरी का दिन भारत के लिए गर्व, सम्मान और संविधान के मूल्यों को याद करने का अवसर लेकर आता है। Republic Day केवल झांकियों, परेड और देशभक्ति के नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस दिन की याद दिलाता है जब देश ने खुद को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया था। यह दिन हमें अधिकारों के साथ-साथ जिम्मेदारियों का भी एहसास कराता है। असली मायने में गणतंत्र दिवस तभी सार्थक है, जब हम यह सोचें कि क्या लोकतंत्र की ताकत आज भी आम नागरिक के जीवन में दिखाई देती है।
लोकतंत्र केवल शासन की एक प्रणाली नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के सम्मान, स्वतंत्रता और भागीदारी का प्रतीक है। जब आम आदमी को अपनी आवाज़ रखने, फैसलों में हिस्सा लेने और समान अवसर मिलने लगते हैं, तभी लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ सामने आता है। कागजों पर लोकतंत्र मजबूत दिखता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार इससे अलग नजर आती है।
Republic Day: जमीनी सच्चाई
भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार, न्याय और स्वतंत्रता का भरोसा देता है। सिद्धांत रूप में कोई भी भेदभाव स्वीकार्य नहीं है लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में आम नागरिक को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता है। यही अंतर सिद्धांत और व्यवहार के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
अगर लोकतंत्र सच में मजबूत है, तो युवाओं के सामने रोजगार की चुनौती इतनी बड़ी क्यों बनी हुई है? किसान आज भी आर्थिक दबाव, कर्ज और अनिश्चित आय से क्यों जूझ रहा है? विकास की बातें तो हर मंच पर होती हैं, लेकिन जब तक इसका असर आम नागरिक के जीवन में साफ दिखाई नहीं देता, तब तक लोकतंत्र अधूरा सा लगता है।
वोट सिर्फ चुनाव तक सीमित?
लोकतंत्र में वोट को सबसे बड़ा हथियार माना जाता है। चुनाव के समय जनता की अहमियत सबसे अधिक हो जाती है। बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं और सुनहरे सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद कई नागरिक यह महसूस करते हैं कि उनकी भूमिका सिर्फ मतदान तक सीमित रह गई है। सशक्त लोकतंत्र वही है, जहां नागरिक फैसलों में भी भागीदार बने।
संविधान हर व्यक्ति को अपनी राय रखने की आज़ादी देता है। फिर भी कई लोग खुलकर सवाल पूछने से कतराते हैं। नौकरी जाने का डर, सामाजिक दबाव, कानूनी उलझनें और ऑनलाइन ट्रोलिंग ये सभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देते हैं। लोकतंत्र तब ही मजबूत बनता है, जब नागरिक निडर होकर अपनी बात रख सके।
न्याय व्यवस्था
न्याय लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है, लेकिन क्या यह हर नागरिक के लिए समान रूप से सुलभ है? अदालतों में वर्षों तक लटके केस, महंगी कानूनी प्रक्रिया और गरीब वर्ग की असहायता ये सवाल खड़े करते हैं। अगर न्याय समय पर और सुलभ नहीं है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है। स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स विकास की तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन आम नागरिक पूछता है कि क्या मेरी जिंदगी पहले से बेहतर हुई है? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं वास्तव में सुधरी हैं? अगर विकास का लाभ सीमित वर्ग तक ही पहुंचे, तो लोकतंत्र की भावना खोखली लगने लगती है।
युवा और लोकतंत्र
भारत युवाओं का देश है, लेकिन क्या युवा खुद को व्यवस्था से जुड़ा महसूस कर रहे हैं? कई युवा राजनीति और सामाजिक भागीदारी से दूर हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें बदलाव की उम्मीद कम नजर आती है… जबकि सच यह है कि लोकतंत्र का भविष्य युवाओं की जागरूकता और सक्रियता पर ही टिका है। इस Republic Day 2026 पर केवल उत्सव मनाने के बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हमारा लोकतंत्र सच में आम नागरिक की आवाज़ बन पा रहा है? क्योंकि लोकतंत्र तभी जीवित और मजबूत रहता है, जब जनता सजग, साहसी और जिम्मेदार होती है।
