ग्वालियर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम फैसले में बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए बीमित का दावा खारिज करने को सेवा में कमी माना है। आयोग ने बीमा कंपनी को न सिर्फ पूरा इलाज खर्च लौटाने का आदेश दिया, बल्कि मानसिक क्षतिपूर्ति और वाद खर्च भी चुकाने को कहा है। यह फैसला स्वास्थ्य बीमा से जुड़े उपभोक्ताओं के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है।
मामला ग्वालियर निवासी सूरज सविता (32) से जुड़ा है। सूरज ने वर्ष 2021 में एक समूह स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। 29 अप्रैल 2021 को अचानक उनकी तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच में डॉक्टरों ने निमोनिया की पुष्टि की। करीब दस दिन तक इलाज चलने के बाद 8 मई 2021 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी गई।
ग्वालियर उपभोक्ता आयोग
अस्पताल में भर्ती रहने और इलाज के दौरान सूरज सविता का कुल मेडिकल खर्च 1,38,856 रुपए आया। इलाज के बाद उन्होंने बीमा पॉलिसी की शर्तों के अनुसार सभी जरूरी दस्तावेज, मेडिकल रिपोर्ट और बिल बीमा कंपनी को सौंपकर क्लेम किया। सूरज को उम्मीद थी कि पॉलिसी के तहत उन्हें पूरा भुगतान मिलेगा।
बीमा कंपनी ने 9 जुलाई 2021 को सूरज का दावा खारिज कर दिया। कंपनी का तर्क था कि मेडिकल रिकॉर्ड और बिलों में विसंगतियां हैं, इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस फैसले से आहत होकर सूरज सविता ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
आयोग ने माना सेवा में कमी
दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज देखने के बाद आयोग ने स्पष्ट कहा कि बीमा कंपनी इलाज को फर्जी या खर्च को गलत साबित नहीं कर पाई। आयोग ने टिप्पणी की कि अगर अस्पताल के रिकॉर्ड में कोई कमी थी, तो बीमा कंपनी को अस्पताल से जानकारी लेनी चाहिए थी, न कि सीधे मरीज का दावा खारिज करना चाहिए था।
45 दिन में भुगतान का आदेश
आयोग ने बीमा कंपनी द्वारा जारी दावा खारिज करने के पत्र को निरस्त कर दिया। साथ ही कंपनी को आदेश दिया कि वह 45 दिनों के भीतर 1,38,856 रुपए का भुगतान करे। यदि तय समय में राशि नहीं चुकाई जाती है, तो कंपनी को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। आयोग ने सूरज सविता को मानसिक पीड़ा के लिए 2,000 रुपए और वाद खर्च के लिए भी 2,000 रुपए देने का आदेश दिया। आयोग का यह फैसला बीमा कंपनियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि बिना ठोस आधार के दावे खारिज करना उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है।
