बड़वानी जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में गहराते जल संकट को लेकर दायर जनहित याचिका पर गुरुवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि समस्या को केवल एक जिले या संभाग तक सीमित न रखा जाए, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के लिए व्यापक और दीर्घकालिक जल संरक्षण योजना तैयार की जाए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य के कई हिस्सों में कुएं, तालाब, बावड़ियां और अन्य पारंपरिक जलस्रोत या तो सूख चुके हैं या जर्जर स्थिति में हैं। यदि समय रहते इनके संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और विकट हो सकती है। अदालत ने सरकार से कहा कि प्राकृतिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए और चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाए।
जल संकट पर सख्त हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जल संकट अब स्थानीय मुद्दा नहीं रहा। बदलते मौसम, घटते भूजल स्तर और अव्यवस्थित जल प्रबंधन को देखते हुए इसे राज्यव्यापी नीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। अदालत का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के बिना हर साल गर्मियों में यही स्थिति दोहराई जाएगी। इसलिए योजना ऐसी हो जो संरक्षण, पुनर्भरण और जनजागरूकता—तीनों पहलुओं को समाहित करे।
पिपलांत्री मॉडल का उदाहरण
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट मनीष विजयवर्गीय ने सुनवाई के दौरान राजस्थान के पिपलांत्री गांव का उदाहरण पेश किया। उन्होंने बताया कि वहां जनसहभागिता और सुनियोजित प्रयासों से बंजर और पथरीले इलाके को जल-संरक्षित और हरित क्षेत्र में बदला गया। अदालत ने इस मॉडल पर विचार करने और सामुदायिक भागीदारी को योजना का हिस्सा बनाने पर जोर दिया।
समयबद्ध चुनौती
अदालत के निर्देशों के बाद अब राज्य सरकार के सामने चार सप्ताह में ठोस, व्यवहारिक और राज्यव्यापी योजना प्रस्तुत करने की चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोर्ट के निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ तो इससे आने वाले वर्षों में जल संकट से जूझ रहे जिलों को बड़ी राहत मिल सकती है।
