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इंदौर वनमंडल में तीन दिवसीय गिद्ध गणना शुरू, पहले दिन 97 ईजिप्शियन वल्चर दर्ज

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Published On: 21 February 2026

मध्य प्रदेश में गिद्धों की घटती संख्या पर नजर रखने और उनके संरक्षण को मजबूत बनाने के उद्देश्य से वन विभाग ने द्विवार्षिक गिद्ध गणना अभियान शुरू किया है। इसी कड़ी में इंदौर वनमंडल में 20 फरवरी से तीन दिवसीय शीतकालीन गणना प्रारंभ हुई, जो 22 फरवरी तक जारी रहेगी। यह अभियान प्रदेशव्यापी स्तर पर संचालित किया जा रहा है, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों में गिद्धों की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जा सके।

पहले दिन मौसम पूरी तरह अनुकूल नहीं था। कई स्थानों पर बादल और हल्की बारिश भी हुई, लेकिन इसके बावजूद वन विभाग की 16 टीमों ने तय समय पर सर्वे पूरा किया। इंदौर, महू, मानपुर और चोरल फॉरेस्ट रेंज में सुबह 6 से 8 बजे के बीच चिन्हित स्थानों पर गिद्धों की गिनती की गई। नियम के अनुसार केवल बैठे हुए गिद्धों को ही गणना में शामिल किया गया।

इंदौर: पहले दिन 97 गिद्ध दर्ज

वित्तीय वर्ष 2025-26 के इस अभियान के पहले दिन कुल 97 गिद्ध दर्ज किए गए। विशेष बात यह रही कि सभी गिद्ध ईजिप्शियन वल्चर प्रजाति के पाए गए। रेंजवार आंकड़ों में चोरल रेंज में सर्वाधिक 89 गिद्ध दर्ज हुए, जबकि महू और मानपुर रेंज में दो-दो तथा इंदौर रेंज में चार गिद्ध दिखाई दिए।

वन विभाग के अनुसार इंदौर वनमंडल में 38 स्थानों को सर्वे के लिए चिन्हित किया गया है। इनमें तिंछा फाल, देवगुराड़िया ट्रेंचिंग ग्राउंड, पेडमी और पातालपानी जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इन स्थानों पर गिद्धों की मौजूदगी पहले भी दर्ज की जाती रही है। अधिकारियों का कहना है कि इस बार कुछ क्षेत्रों में मोबाइल ऐप Epicollect5 के जरिए डेटा संकलन किया जा रहा है, जिससे पारदर्शिता और सटीकता बढ़ेगी।

पिछले वर्षों से तुलना

यदि पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025 में इंदौर में 86 गिद्ध दर्ज हुए थे, जबकि 2023 में यह संख्या 114 और 2021 में 117 थी। इस गिरावट ने विभाग की चिंता बढ़ाई है। हालांकि, इस बार पहले दिन के आंकड़े उम्मीद जगाते हैं कि आगामी दो दिनों में संख्या और बढ़ सकती है।

गिद्धों को पर्यावरण का प्राकृतिक सफाईकर्मी माना जाता है, क्योंकि वे मृत पशुओं के अवशेषों को साफ कर बीमारियों के फैलाव को रोकते हैं। डाइक्लोफेनाक जैसी हानिकारक दवाओं पर प्रतिबंध और जनजागरूकता अभियान जैसे कदम संरक्षण की दिशा में उठाए जा रहे हैं। विभाग का मानना है कि नियमित गणना और वैज्ञानिक रणनीति से गिद्धों की संख्या में सुधार संभव है।

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