राजधानी भोपाल के हमीदिया अस्पताल में वर्षों से बंद पड़ी कोबाल्ट थैरेपी मशीन अब चिंता का विषय बन गई है। करीब 40 साल पुरानी इस मशीन के भीतर आज भी रेडियोएक्टिव सोर्स मौजूद है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसे वैज्ञानिक तरीके से निष्क्रिय नहीं किया गया, तो यह संभावित खतरा बन सकती है।
इस मामले को लेकर गांधी मेडिकल कॉलेज के ऑन्कोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने डीन को विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है। प्रबंधन का कहना है कि मामला उनके संज्ञान में है और मशीन को डीकमीशन करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके लिए शासन से बजट की मांग की गई है।
हमीदिया अस्पताल
रेडिएशन विशेषज्ञों के अनुसार, कोबाल्ट मशीनों में रेडियोधर्मी स्रोत मोटी धातु की शील्डिंग में सुरक्षित रखा जाता है, जो रेडिएशन को बाहर निकलने से रोकती है। लेकिन चार दशक पुरानी मशीन में धातु की गुणवत्ता, जंग और रखरखाव की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। समय के साथ शील्डिंग कमजोर हो सकती है। यदि सुरक्षा परत में दरार आई या जंग से क्षति हुई, तो रेडिएशन रिसाव का खतरा बढ़ सकता है।
स्टाफ और मरीजों के लिए संभावित जोखिम
हालांकि मशीन फिलहाल उपयोग में नहीं है, लेकिन इसके भीतर मौजूद रेडियोधर्मी पदार्थ चिंता का कारण बने हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसे समय पर सुरक्षित तरीके से नहीं हटाया गया, तो कैंसर विभाग के स्टाफ, मरीजों और आसपास के लोगों के लिए जोखिम उत्पन्न हो सकता है। इस तरह की मशीनों को निष्क्रिय करने के लिए सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन जरूरी होता है।
26 लाख की मंजूरी पर अटका मामला
मशीन को वैज्ञानिक तरीके से डिस्मेंटल करने और रेडियोधर्मी स्रोत हटाने में करीब 26 लाख रुपए खर्च आने का अनुमान है। यह काम केवल अधिकृत एजेंसी द्वारा ही किया जा सकता है। फिलहाल बजट की स्वीकृति नहीं मिलने से पूरी प्रक्रिया रुकी हुई है। जब तक राशि मंजूर नहीं होती, मशीन उसी स्थिति में पड़ी रहेगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा को देखते हुए इस मामले में जल्द निर्णय लिया जाना जरूरी है।
