मध्य प्रदेश में बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़े स्तर पर निवेश किया गया। स्मार्ट मीटर लगाने, लाइन लॉस कम करने और बिलिंग-वसूली सिस्टम को मजबूत करने के नाम पर 4700 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए। इसके बावजूद बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। विधानसभा में सरकार ने स्वीकार किया है कि कंपनियों के सामने अब भी हजारों करोड़ रुपए का राजस्व अंतर बना हुआ है।
इसी वित्तीय दबाव को देखते हुए बिजली कंपनियों ने वर्ष 2026-27 के लिए टैरिफ में 10.19 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग को भेजा है। यदि आयोग इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो प्रदेश के लाखों उपभोक्ताओं पर सीधा असर पड़ेगा।
बिजली कंपनियां घाटे में
वर्तमान में प्रदेश के सामान्य घरेलू उपभोक्ता 150 से 300 यूनिट मासिक खपत पर औसतन 1400 से 2800 रुपए तक बिजली बिल चुका रहे हैं। प्रस्तावित बढ़ोतरी लागू होने पर इसी खपत वर्ग के उपभोक्ताओं के बिल में करीब 150 से 300 रुपए प्रतिमाह अतिरिक्त जुड़ सकते हैं। वहीं, 400 यूनिट या उससे अधिक बिजली उपयोग करने वाले परिवारों का मासिक बिल 400 से 600 रुपए तक बढ़ने की आशंका है।
सुधारों का लाभ जमीन पर सवालों में
बिजली कंपनियों का तर्क है कि लाइन लॉस कम करने और बिलिंग व्यवस्था सुधारने के बावजूद वसूली और उत्पादन लागत के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। हालांकि, उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि जब हजारों करोड़ रुपए सुधार योजनाओं पर खर्च किए जा चुके हैं, तो उसका स्पष्ट लाभ पहले दिखना चाहिए था। ऐसे में सीधे दर बढ़ाने का प्रस्ताव आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डालेगा।
आयोग के फैसले पर टिकी निगाहें
अब सभी की निगाहें विद्युत नियामक आयोग के निर्णय पर टिकी हैं। आयोग प्रस्ताव पर सुनवाई कर उपभोक्ताओं और कंपनियों दोनों के पक्षों पर विचार करेगा। यदि दर वृद्धि को मंजूरी मिलती है, तो आने वाले वित्तीय वर्ष में बिजली बिल में बढ़ोतरी तय मानी जा रही है।
