आज के दौर में फिल्मों का मतलब अक्सर बड़े सेट, महंगे VFX और लंबी स्टारकास्ट से लगाया जाता है। लेकिन सिनेमा का असली दम कभी-कभी सादगी में छिपा होता है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल है 27 साल पुरानी एक फिल्म, जिसे देखने के बाद आप लाइट बंद करके चैन से नहीं बैठ पाएंगे। न ज्यादा कलाकार, न अलग-अलग लोकेशन, फिर भी सस्पेंस ऐसा कि आखिरी मिनट तक दिमाग घूमता रहे। हम बात कर रहे हैं राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘कौन?’ की।
आज जब एक फिल्म बनने में महीनों नहीं बल्कि साल लग जाते हैं, तब यह जानकर हैरानी होती है कि ‘कौन?’ जैसी फिल्म महज 15 दिनों में शूट कर ली गई थी। पूरी फिल्म की शूटिंग एक ही घर में हुई और पूरी कहानी सिर्फ तीन कलाकारों के इर्द-गिर्द घूमती है। कम बजट, सीमित संसाधन और छोटा सा सेट लेकिन कहानी और माहौल इतना दमदार कि दर्शक सीट से हिल नहीं पाता।
राम गोपाल वर्मा की वो फिल्म
1999 का दौर रोमांटिक और एक्शन फिल्मों का था। उसी समय राम गोपाल वर्मा ने दर्शकों के सामने एक ऐसी साइकोलॉजिकल थ्रिलर रख दी, जो न सिर्फ डराती है बल्कि सोचने पर मजबूर भी करती है। यही वजह है कि ‘कौन?’ आज कल्ट क्लासिक मानी जाती है। फिल्म में उर्मिला मातोंडकर, मनोज बाजपेयी और सुशांत सिंह नजर आते हैं, लेकिन पूरी कहानी असल में दो किरदारों के बीच के दिमागी खेल पर टिकी है।
एक न्यूज से शुरू होता है डर
फिल्म की शुरुआत बेहद साधारण लगती है। एक लड़की (उर्मिला मातोंडकर) अपने घर में अकेली है और फोन पर अपने माता-पिता से बात कर रही है। तभी टीवी पर एक सीरियल किलर की खबर चलती है। माहौल तभी से भारी हो जाता है। बारिश, अकेलापन और बाहर की डरावनी खबरें यहीं से मन में बेचैनी बैठ जाती है।
घंटी बजती है और सब बदल जाता है. अचानक दरवाजे की घंटी बजती है। बाहर खड़ा होता है एक अजनबी समीर पूनावाले (मनोज बाजपेयी)। वह किसी और से मिलने आया होता है, लेकिन हालात ऐसे बनते हैं कि वह घर के अंदर आ जाता है। बस यहीं से फिल्म का असली खेल शुरू होता है।
अंधेरा, शक और एक मरी हुई बिल्ली, लाइट चली जाती है। सन्नाटा और गहरा हो जाता है। तभी किचन में एक ऐसा सीन सामने आता है, जो दर्शक को झकझोर देता है घर की पालतू बिल्ली मरी हुई मिलती है। अब सवाल उठता है—कातिल कौन है? क्या बाहर खड़ा आदमी सीरियल किलर है? या फिर सच्चाई कुछ और है? यहीं से शक का ऐसा जाल बुनता है कि हर किरदार संदिग्ध लगने लगता है।
आखिरी सीन तक नहीं खुलता राज
‘कौन?’ की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह आपको आखिरी सीन तक अंधेरे में रखती है। हर बार लगता है कि अब सच सामने आ जाएगा, लेकिन कहानी नया मोड़ ले लेती है। क्लाइमैक्स ऐसा है कि देखने के बाद कुछ सेकंड तक दिमाग सुन्न पड़ जाता है।
कम बजट, बड़ी कमाई
इस फिल्म का बजट करीब 2.25 करोड़ रुपये था, जबकि कमाई लगभग 4 करोड़ रुपये तक पहुंची। यानी फिल्म न सिर्फ क्रिटिक्स को पसंद आई, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही। IMDb पर इसे 7.8 की शानदार रेटिंग मिली है, जो आज भी इसकी लोकप्रियता को साबित करती है।
