हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम दौर सिर्फ बेहतरीन फिल्मों के लिए ही नहीं, बल्कि मेहनती कलाकारों की वजह से भी याद किया जाता है। उस दौर में काम को लेकर जो ईमानदारी और समर्पण देखने को मिलता था, वह आज भी मिसाल माना जाता है। ऐसे ही एक किस्से का नाम मोहम्मद रफी है।
मोहम्मद रफी सिर्फ एक गायक नहीं थे, बल्कि भावना, अनुशासन और जिम्मेदारी का दूसरा नाम थे। करीब चार दशकों के अपने करियर में उन्होंने हर तरह के गीत गाए रोमांटिक, देशभक्ति, दर्द भरे और भक्ति गीत। लेकिन साल 1969 में उन्होंने जो किया, वह आज भी लोगों को हैरान कर देता है।
रफी साहब की मेहनत
साल 1969 में मोहम्मद रफी को करीब दो महीने के लिए विदेश टूर पर जाना था। लेकिन देश से बाहर जाने से पहले वह यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनके कारण किसी निर्माता या संगीतकार का काम रुके नहीं। उस वक्त उन्होंने मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ पांच गानों का कमिटमेंट लिया हुआ था।
जब संगीतकारों को पता चला कि रफी साहब विदेश जा रहे हैं, तो उन्होंने उनसे निवेदन किया कि इन पांच गानों की रिकॉर्डिंग पहले हो जाए। आम तौर पर इतने गानों के लिए कई दिन लग जाते थे, लेकिन रफी साहब ने बिना किसी हिचक के जवाब दिया –
“आप चिंता मत कीजिए, मैं ये सारे गाने रिकॉर्ड करके ही जाऊंगा।”
5 यादगार गीत
इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास बन गया। मोहम्मद रफी ने एक ही दिन में लगातार करीब 12 घंटे स्टूडियो में रहकर पांच गानों की रिकॉर्डिंग की। खास बात यह थी कि ये गाने किसी एक फिल्म के नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग फिल्मों के लिए थे।
आज के दौर में जहां एक गाने की रिकॉर्डिंग में भी कई सत्र लग जाते हैं, वहां उस समय इस तरह का काम करना आसान नहीं था। लेकिन रफी साहब के लिए संगीत सिर्फ काम नहीं, इबादत था।
फिल्म और कलाकार
अगर इन पांच गानों पर नजर डालें तो ये तीन बड़े सितारों की फिल्मों से जुड़े थे।
सबसे पहले उन्होंने जीतेंद्र की फिल्म मां और ममता के लिए दो गीत रिकॉर्ड किए-
रूत बेकरार है…
अपने नैनों को समझा दो…
इसके बाद बारी आई धर्मेंद्र की फिल्म मन की आंखें की, जिसके लिए रफी साहब ने दो और गीत गाए-
दिल कहे रुक जा रे रुक जा…
टूटे जो बलाएं…
आखिर में उन्होंने राजेंद्र कुमार की फिल्म अनजान का टाइटल सॉन्ग रिकॉर्ड किया-
मैं राही अनजान राहों का…
इन सभी गीतों में भाव, ऊर्जा और आवाज़ की ताजगी साफ झलकती है, जो इस बात का सबूत है कि रफी साहब ने थकान को कभी अपनी कला पर हावी नहीं होने दिया।
आज के दौर के लिए सीख
आज जब कलाकार शिफ्ट टाइमिंग, वर्क-लाइफ बैलेंस और डेट्स को लेकर बहस करते नजर आते हैं, तब मोहम्मद रफी का यह किस्सा हमें उस दौर की सादगी और प्रोफेशनल ईमानदारी की याद दिलाता है। उन्होंने न कभी शिकायत की, न कभी दिखावा किया। उनका मानना था कि अगर किसी ने आप पर भरोसा किया है, तो उस भरोसे को निभाना आपका फर्ज है।
क्यों आज भी अमर हैं रफी साहब
मोहम्मद रफी की आवाज़ आज भी उतनी ही ताजा लगती है, जितनी दशकों पहले लगती थी। उनके गीत समय से परे हैं और हर पीढ़ी को छूते हैं। एक ही दिन में पांच गानों की रिकॉर्डिंग सिर्फ उनकी मेहनत नहीं, बल्कि उनके चरित्र की भी कहानी कहती है।
