पूर्वी लद्दाख के बर्फीले इलाके पैंगोंग त्सो में चीन की गतिविधियां एक बार फिर सुर्खियों में हैं। हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन इस संवेदनशील और विवादित क्षेत्र में अपनी स्थायी सैन्य मौजूदगी को लगातार मजबूत कर रहा है। भारत और चीन के बीच बने मिलिट्री बफर ज़ोन के बेहद करीब चीन नई इमारतों और ढांचों का निर्माण कर रहा है। यह निर्माण उस क्षेत्र के आसपास हो रहा है, जो 1962 के युद्ध के बाद से चीन के नियंत्रण में है। भारत आज भी इसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है।
पूर्वी लद्दाख के बर्फीले और रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील इलाके पैंगोंग त्सो में चीन की गतिविधियां एक बार फिर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालिया हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन भारत-चीन के बीच तय मिलिट्री बफर ज़ोन के नजदीक लगातार नई इमारतें, सड़कों और सैन्य ढांचे का निर्माण कर रहा है।
पूर्वी लद्दाख में चीन
पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील के बेहद करीब चीन एक नए सैन्य परिसर का निर्माण कर रहा है, जहां कई पक्की इमारतें तेजी से खड़ी की जा रही हैं। यह परिसर झील के पानी से महज कुछ मीटर की दूरी पर स्थित बताया जा रहा है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस निर्माण से चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को भारत-चीन के बीच बने मौजूदा मिलिट्री बफर जोन के पास अतिरिक्त संसाधन, सैनिक और सैन्य साजो-सामान तैनात करने में आसानी हो सकती है, जिसे क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधि के रूप में देखा जा रहा है।
China is constructing new buildings near the military buffer zone with India at Pangong Tso, while the activity is within Chinese held territory, it consolidates Beijing’s physical presence post the 2020 border dispute & subtly recalibrates its territorial claims in the region pic.twitter.com/RSR6km5YHg
— Damien Symon (@detresfa_) January 4, 2026
2020 के बाद बदली तस्वीर
2020 के बाद से पैंगोंग त्सो क्षेत्र में चीनी सेना ने अस्थायी ढांचों के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए रखी थी, जिनमें सैनिकों के ठहरने की व्यवस्था, झील में आवाजाही के लिए नावें और एक पियर शामिल थे, लेकिन हालिया सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिलता है कि अब यह अस्थायी व्यवस्था धीरे-धीरे स्थायी निर्माण में बदल रही है। तस्वीरों में पुराने टेम्परेरी स्ट्रक्चर के साथ नए पक्के निर्माण स्थल साफ दिखाई दे रहे हैं और दिसंबर के अंत तक यहां निर्माण कार्य में तेजी नजर आती है, जबकि जून में झील के पास दिखने वाली नावें अब ढकी हुई और पानी से दूर खड़ी हैं, जो सर्दियों में झील के जमने की आशंका और दीर्घकालिक सैन्य तैयारियों की ओर इशारा करता है।
2013 से शुरू हुई थी तैयारी
इस इलाके में चीन की तैयारियां कोई नई नहीं हैं। वर्ष 2013 में यहां सड़क नेटवर्क विकसित किया गया था, जिसका शुरुआती दौर में भारत और चीन दोनों की सेनाएं गश्त के लिए इस्तेमाल करती थीं। हालांकि मई 2020 में हुए सीमा गतिरोध के बाद भारतीय गश्ती दलों की इस क्षेत्र में मौजूदगी रुक गई, जिसके बाद चीन ने मौके का फायदा उठाते हुए अपनी गतिविधियां तेज कर दीं और धीरे-धीरे इस इलाके में अपनी पकड़ को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए।
सैटेलाइट तस्वीरों
विशेषज्ञों के मुताबिक, 2025 के दूसरे हिस्से में इस इलाके में निर्माण कार्य की रफ्तार साफ तौर पर तेज हुई है। दिसंबर में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में कई इमारतों के पक्के ढांचे उभरते हुए दिखाई देते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह निर्माण किसी अस्थायी जरूरत के लिए नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक और रणनीतिक योजना के तहत किया जा रहा है।
