भाद्रपद मास के दशमी तिथि को मनाया जायेगा दसवाँ श्राद्ध, पितरों की आत्मा शांति का विशेष दिन; जानें महत्व

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Published On: 16 September 2025

16 सितंबर का दिन धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस दिन भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि है, जिसे दशमी श्राद्ध या दसवाँ श्राद्ध कहा जाता है। पितृ पक्ष में यह श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु दशमी तिथि को हुई हो। इस अवसर पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म सम्पन्न करेंगे।

आज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि है। इस दिन दशमी श्राद्ध मनाया जाएगा, जिसे दसवाँ श्राद्ध भी कहा जाता है। यह श्राद्ध विशेष रूप से उन पितरों की स्मृति में किया जाता है जिनकी मृत्यु दशमी तिथि को हुई थी।

दशमी श्राद्ध

16 सितंबर को भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि है और इस दिन दशमी श्राद्ध मनाया जाएगा। यह श्राद्ध उन मृतक सदस्यों के लिए विशेष रूप से किया जाता है जिनकी मृत्यु दशमी तिथि पर हुई हो। पितृ पक्ष में शुक्ल और कृष्ण पक्ष दोनों की दशमी तिथि पर यह श्राद्ध किया जा सकता है। पार्वण श्राद्ध के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त शुभ माने जाते हैं। अनुष्ठान को अपराह्न काल तक पूरा किया जाता है और अंत में तर्पण किया जाता है, जिससे पितरों को शांति और तृप्ति प्राप्त होती है। दशमी श्राद्ध पितृ पक्ष के अंतर्गत किया जाता है। इसे दसवाँ श्राद्ध भी कहा जाता है और पारंपरिक रूप से इस दिन विशेष भोजन और पितरों के लिए तर्पण किया जाता है।

महत्व

  • 16 सितंबर 2025 को भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि पर दशमी श्राद्ध मनाया जाएगा।
  • यह पितृ पक्ष का पवित्र दिन है और इस दिन उन पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं जिनकी मृत्यु दशमी तिथि को हुई थी।
  • ऐसा करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे वंशजों को सुख, शांति और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं।
  • इस वर्ष यह दिन मंगलवार को पड़ रहा है।
  • इसलिए हनुमान जी की पूजा और मंगल दोष निवारण का विशेष महत्व भी माना जा रहा है।

श्राद्ध के उपाय

  • श्राद्ध तिथि पर सुबह सूर्योदय से लेकर दिन के 12 बजकर 24 मिनट तक पितरों के श्राद्ध का आयोजन किया जाता है।
  • इस अवसर पर घर की सफाई कर गंगाजल और गौमूत्र का छिड़काव किया जाता है और दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण किया जाता है।
  • महिलाएं पवित्र होकर पितरों के लिए भोजन तैयार करती हैं और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आमंत्रित कर भोजन कराती हैं।
  • पितरों की तुष्टि के लिए अग्नि में गाय के दूध से बनी खीर अर्पित की जाती है और पंचबलि का आयोजन किया जाता है।
  • ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद दक्षिणा और सामग्री दान में गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि शामिल होते हैं।
  • श्राद्ध में सफेद फूलों का उपयोग किया जाता है।
  • घर के आंगन में रंगोली बनाई जाती है।
  • दूध, गंगाजल, शहद, सफेद कपड़े, अभिजित मुहूर्त व तिल का विशेष महत्व होता है।

डिस्केलमर: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं विभिन्न माध्यमों/ ज्योतिषियों/ पंचांग/ प्रवचनों/ मान्यताओं/ धर्मग्रंथों पर आधारित हैं. MPNews इनकी पुष्टि नहीं करता है।

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