MP में कमलनाथ सरकार के दौरान वर्ष 2019 में जारी किया गया एक आदेश आज भी तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा रहा है। इस आदेश के चलते कर्मचारी चयन मंडल के माध्यम से नियुक्त होने वाले कर्मचारियों की परिवीक्षा अवधि तीन साल कर दी गई थी, जबकि इससे पहले यह अवधि दो वर्ष की थी। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस फैसले ने हजारों कर्मचारियों की आय पर सीधा असर डाला है।
नियमों के मुताबिक, तीन साल की परिवीक्षा अवधि के दौरान कर्मचारियों को पहले वर्ष 70 प्रतिशत, दूसरे वर्ष 80 प्रतिशत और तीसरे वर्ष 90 प्रतिशत वेतन दिया जाता है। चौथे वर्ष से जाकर उन्हें पूरा वेतन मिलता है। इसका मतलब यह हुआ कि नए कर्मचारी तीन साल तक पूरी सैलरी से वंचित रहते हैं, जिससे उन्हें चार लाख रुपए तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
दो अलग नियम
कर्मचारी नेताओं का आरोप है कि यह व्यवस्था समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत के खिलाफ है। मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग के जरिए नियुक्त होने वाले कर्मचारियों की परिवीक्षा अवधि दो साल की है और उन्हें परिवीक्षा पूरी होने के बाद पहले वर्ष से ही पूर्ण वेतन मिल जाता है। वहीं, कर्मचारी चयन मंडल से भर्ती कर्मचारियों को तीन साल की परिवीक्षा झेलनी पड़ती है। इससे कर्मचारियों के बीच असमानता बढ़ रही है।
कर्मचारी संघ ने गिनाया नुकसान
तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के महामंत्री उमाशंकर तिवारी के अनुसार, जनवरी 2023 में नियुक्त कर्मचारी को दिसंबर 2025 तक आंशिक वेतन मिलने से बड़ा घाटा हो रहा है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, जिनका मूल वेतन 15,500 रुपए है, उन्हें करीब 1.74 लाख रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। तृतीय श्रेणी में 18,000 मूल वेतन पर यह नुकसान 2 लाख रुपए से ज्यादा हो जाता है, जबकि 36,200 रुपए मूल वेतन वाले कर्मचारी को चार लाख रुपए से अधिक का घाटा झेलना पड़ रहा है।
न्याय के सिद्धांत पर सवाल
तिवारी का कहना है कि 12 दिसंबर 2019 के बाद नियुक्त कर्मचारियों पर यह नियम लागू किया गया, जिससे बड़ी संख्या में कर्मचारी प्रभावित हुए हैं। उनका आरोप है कि यह व्यवस्था नैसर्गिक न्याय के खिलाफ है, क्योंकि एक ही विभाग और एक ही काम के लिए अलग-अलग नियम लागू किए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री से की गई मांग
कर्मचारी संघ ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर मांग की है कि चतुर्थ और तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों के लिए परिवीक्षा अवधि फिर से दो वर्ष की जाए। साथ ही, 2019 के आदेश को निरस्त कर कर्मचारियों को आर्थिक राहत देने की अपील की गई है। कर्मचारी नेताओं को उम्मीद है कि सरकार इस मुद्दे पर जल्द फैसला लेकर हजारों कर्मचारियों को राहत देगी।
