भोपाल | MP के सरकारी विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। बजट की कमी और भर्ती प्रक्रिया में देरी की वजह से यह स्थिति बनी हुई है। हालात यह हैं कि प्रदेश के पांच विश्वविद्यालयों में एक भी सहायक प्राध्यापक नहीं है। राजधानी भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में 61 पद स्वीकृत हैं, लेकिन 33 पद खाली हैं। वहीं भोज विश्वविद्यालय में 34 में से 30 पद रिक्त पड़े हैं। अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय (बिलासपुर) और अन्य संस्थानों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है।
इतने पोस्ट खाली
उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय में 85 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 56 खाली हैं। ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में 58 में से 43 पद खाली हैं। प्रदेशभर में कुल 1,069 पदों में से 793 पद रिक्त हैं, यानी लगभग 74 प्रतिशत। इन हालातों के चलते विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का स्तर गिर रहा है और अधिकांश विभाग अतिथि विद्वानों के भरोसे चल रहे हैं। छात्र-छात्राओं को स्थायी प्राध्यापकों के मार्गदर्शन और शोध कार्य में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री पर आरोप
पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री पर आरोप है कि उनके कार्यकाल में सहायक प्राध्यापकों की भर्ती को लेकर गंभीर प्रयास नहीं हुए। 2022 में भर्ती प्रक्रिया शुरू जरूर की गई थी, लेकिन तकनीकी अड़चनों और आरक्षण संबंधी उलझनों के चलते नियुक्तियां टलती रहीं। यही वजह है कि 2025 तक भी विश्वविद्यालयों में खाली पदों पर भर्ती नहीं हो सकी। बेरोजगार उम्मीदवारों का आरोप है कि सरकार भर्ती प्रक्रिया को जानबूझकर टाल रही है और योग्य अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
भर्ती प्रक्रिया करें शुरू
बेरोजगार युवाओं का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में पारदर्शी है, तो तुरंत खाली पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू करे। कई प्रतिभाशाली उम्मीदवारों ने सवाल उठाया है कि क्या अब स्थायी नौकरी पाने के लिए भी “कमीशन संस्कृति” लागू कर दी जाएगी। कुछ युवाओं ने व्यंग्य करते हुए कहा कि अगर सरकार को सहायक प्राध्यापक बनना है तो शायद 50 प्रतिशत कमीशन भी देना पड़ेगा, और अगर ऐसा ही है तो अगली कैबिनेट बैठक में इस ऑफर को खुले तौर पर घोषित कर देना चाहिए।
इस मुद्दे पर शिक्षा जगत के जानकारों का कहना है कि लंबे समय से भर्तियां अटकी रहने से विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। छात्रों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा और रिसर्च जैसी गतिविधियां ठप पड़ी हैं। अब देखना होगा कि सरकार इस गंभीर समस्या पर क्या कदम उठाती है।
