सतना जिले में मिलावटखोरी का खेल खुलेआम चल रहा है और खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अफसर मानो आंखों पर पट्टी बांधे बैठे हैं। साल 2025 में अब तक सौ से ज्यादा खाद्य पदार्थों के सैंपल लिए गए, लेकिन नतीजा क्या निकला? ज़ीरो। जांच रिपोर्ट महीनों से अटकी पड़ी है, जैसे किसी को उसकी परवाह ही नहीं।
दीपावली का वक्त है, बाजारों में चकाचक मिठाइयों की सजावट देखकर लोग खुश हो रहे हैं, लेकिन उन मिठाइयों में क्या मिल रहा है, ये जानने वाला कोई नहीं। शहर से लेकर गांवों तक दूध, पनीर और खोवा में मिलावट की बू फैली हुई है। मिलावटी सामग्री खुलेआम बिक रही है और अधिकारी जांच के नाम पर खानापूर्ति करके फाइलों में धूल झाड़ रहे हैं।
एक-दो दिन का मामला नहीं
खास बात ये है कि यह सब कोई एक-दो दिन का मामला नहीं है। सतना और मैहर दोनों जगहों में खाद्य विभाग के अधिकारी सालों से एक ही कुर्सी पर जमे हुए हैं। इनकी पकड़ ऐसी है कि न कोई इन पर सवाल उठाता है और न ही कोई कार्रवाई होती है। जिले के लोग अब कहने लगे हैं ये तो “अंगद के पैर” हैं, जिन्हें कोई हिला नहीं सकता।
बिरसिंहपुर, कोटर, चित्रकूट और नागौद जैसे इलाकों में जब-जब जांच टीम पहुंचती है, तो पहले से ही खबर फैल जाती है। बाजार वाले साफ-सफाई कर लेते हैं और टीम लौटने के बाद फिर वही पुराना खेल शुरू हो जाता है। सैंपल लेने की प्रक्रिया बस औपचारिकता बनकर रह गई है। बाद में कोई रिपोर्ट नहीं आती, न किसी पर कार्रवाई होती है, न किसी दुकान पर ताला लगता है।
ग्राहक खुश
इधर, दीपावली के बहाने बाहर से आने वाले पैकेटबंद मिठाई और मावा की बाढ़ सी आ गई है। बाजार में यह माल बिना किसी टेस्ट या सर्टिफिकेट के बिक रहा है। ग्राहक कीमत देखकर खुश हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं कि सस्ता माल उनके शरीर को कितना महंगा पड़ सकता है। मिलावटी तेल, घटिया मावा और नकली घी से बनी मिठाइयां सीधा सेहत को चोट पहुंचा रही हैं।
आम जनता में गुस्सा
आम जनता में गुस्सा है कि आखिर विभाग क्या कर रहा है। शिकायतें कई बार की गईं, लेकिन अधिकारी या तो चित्रकूट मेले की व्यस्तता का बहाना बनाते हैं या रिपोर्ट आने का इंतजार दिखाकर मामला टाल देते हैं। लोग कहते हैं कि अब जांच सिर्फ वसूली का जरिया बनकर रह गई है। ऊपर से दबाव है, नीचे से सेटिंग मिलावटखोरी पर रोक लगने की उम्मीद लगभग खत्म हो गई है।
खाद्य विभाग के दफ्तर में बैठे अफसरों की मौज है। सालों से वही चेहरे, वही रवैया। किसी को ट्रांसफर का डर नहीं, किसी को कार्रवाई की चिंता नहीं। इस लापरवाही का खामियाजा आम आदमी भुगत रहा है, जिसे लगता है वो शुद्ध चीज़ खा रहा है, जबकि अंदर जहर भर रहा है।
