राजधानी भोपाल की पहचान और लाइफ लाइन माने जाने वाले बड़ा तालाब पर अतिक्रमण का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। पिछले दस वर्षों में तालाब के कैचमेंट एरिया में सैकड़ों पक्के निर्माण खड़े हो चुके हैं। कई निर्माण तो फुल टैंक लेवल (एफटीएल) की मुनारों से सटकर बनाए गए हैं, जो नियमों के विपरीत हैं। हैरानी की बात यह है कि बार-बार सर्वे के बावजूद जमीनी कार्रवाई न के बराबर दिखाई दे रही है।
मामले को लेकर National Green Tribunal (एनजीटी) कई बार जिला प्रशासन और नगर निगम को फटकार लगा चुका है। हाल ही में सांसद आलोक शर्मा ने भी अधिकारियों की बैठक लेकर सख्त नाराजगी जताई। इसके बाद कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने जिला स्तरीय टास्क फोर्स गठित की है, जो अतिक्रमण पर निगरानी रखेगी। प्रशासनिक स्तर पर एसडीएम और तहसीलदारों के साथ बैठकें शुरू हो चुकी हैं, जिससे संकेत मिल रहे हैं कि जल्द बड़े पैमाने पर कार्रवाई हो सकती है।
भोपाल का बड़ा तालाब अतिक्रमण
जानकारी के मुताबिक, बीते दस वर्षों में बड़ा तालाब क्षेत्र का तीन बार सर्वे किया जा चुका है। हर बार बड़ी संख्या में अतिक्रमण सामने आए, लेकिन सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो सकी। नतीजतन बैरागढ़, खानूगांव, सूरज नगर, गौरागांव और बिसनखेड़ी जैसे इलाकों में मैरिज गार्डन, फार्म हाउस, स्कूल-कॉलेज और निजी मकानों की सीमाएं तालाब क्षेत्र तक पहुंच गई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि फाइलों में कार्रवाई दिखती है, जमीन पर नहीं।
नियमों की खुली अनदेखी
विशेषज्ञ राशिद नूर के अनुसार शहरी सीमा में तालाब से 50 मीटर और ग्रामीण सीमा में 250 मीटर तक किसी भी तरह का निर्माण प्रतिबंधित है। इसके बावजूद एफटीएल मुनार से सटे पक्के ढांचे खड़े हैं। भदभदा, बील गांव और सूरजनगर में बड़े रिसॉर्ट और फार्म हाउस तक विकसित हो चुके हैं। कुछ जगहों पर नगर निगम की सीवेज लाइन और सड़क निर्माण भी नियमों के विपरीत बताए जा रहे हैं।
रामसर साइट पर भी खतरा
गौरतलब है कि बड़ा तालाब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त Ramsar Convention के तहत रामसर साइट घोषित है। इसके बावजूद अतिक्रमण की समस्या लगातार बनी हुई है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो तालाब का जलस्तर और पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर संकट में पड़ सकता है।
