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IFS अधिकारी विपिन पटेल ने दिया इस्तीफा, निजी कारण बताए; पहले भी रह चुके हैं विवादों में

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Published On: 5 February 2026

MP कैडर के 2013 बैच के भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी विपिन पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वर्तमान में वे जबलपुर में डीएफओ (योजना) के पद पर पदस्थ थे। इससे पहले विपिन पटेल रीवा, दमोह, सतना और अनूपपुर जैसे महत्वपूर्ण वन मंडलों में डीएफओ की जिम्मेदारी निभा चुके हैं। उनके इस्तीफे की खबर सामने आने के बाद प्रशासनिक और वन विभाग के हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

विपिन पटेल ने अपना इस्तीफा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) और हॉफ को भेजा है। 4 फरवरी 2026 को लिखे गए पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे अपनी आईएफएस सेवा से बिना किसी शर्त के इस्तीफा दे रहे हैं। उन्होंने इस्तीफे का कारण निजी बताया है और अनुरोध किया है कि उनका आवेदन सक्षम प्राधिकारी को अग्रेषित कर उन्हें आईएफएस सेवा से मुक्त किया जाए। इस पत्र की प्रति वन विभाग के सचिव को भी भेजी गई है।

IFS ने दिया इस्तीफा

इस्तीफे में किसी प्रकार का विस्तृत कारण नहीं बताया गया है, लेकिन ‘निजी कारण’ शब्द ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर वरिष्ठ सेवाओं में कार्यरत अधिकारी जब इस तरह अचानक इस्तीफा देते हैं, तो इसके पीछे व्यक्तिगत के साथ-साथ पेशेवर दबावों की भी चर्चा होती है। हालांकि, फिलहाल विभागीय स्तर पर इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।

विपिन पटेल का कार्यकाल हमेशा शांत नहीं रहा। सतना और अनूपपुर में डीएफओ रहते हुए वे कई बार विवादों में घिरे। अनूपपुर में उनके द्वारा जारी एक आदेश ने प्रदेशभर में विरोध खड़ा कर दिया था। इस आदेश में उनके क्षेत्राधिकार में वनकर्मियों को दिए गए उच्च पदभार को तत्काल निरस्त करने के निर्देश थे और सभी कर्मचारियों को मूल पद पर कार्य करने के लिए कहा गया था।

कर्मचारी संगठनों का विरोध और लोकायुक्त मामला

इस आदेश के बाद मध्यप्रदेश कर्मचारी मंच ने सरकार को पत्र लिखकर विरोध दर्ज कराया था। कर्मचारी संगठनों का कहना था कि इस तरह का आदेश जारी करने का अधिकार केवल उच्च स्तर के अधिकारियों को है, न कि किसी डीएफओ को। इसके अलावा, सागर में उनके खिलाफ लोकायुक्त पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई गई थी, जिसकी जांच अब भी लंबित बताई जा रही है। कर्मचारी मंच के नेताओं ने यह भी आरोप लगाया था कि विपिन पटेल अपने पूर्व पदस्थापनों के दौरान भी विवादों में रहे।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार की सक्षम प्राधिकारी उनके इस्तीफे पर क्या निर्णय लेती है। यदि इस्तीफा स्वीकार किया जाता है, तो यह मध्यप्रदेश वन सेवा कैडर के लिए एक अहम घटनाक्रम माना जाएगा।

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