महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम बदलकर वीबी जीरामजी किए जाने को लेकर जहां सियासत गरम है, वहीं योजना की जमीनी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। मध्य प्रदेश में मनरेगा का मौजूदा फंड लगभग समाप्त हो चुका है और केंद्र सरकार पर राज्य का 704.64 करोड़ रुपये का बकाया बताया गया है। यह जानकारी भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से राज्यसभा में दिए गए जवाबों से सामने आई है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने उच्च सदन में तीन अलग-अलग सवालों के जवाब में विस्तृत आंकड़े पेश किए। इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि मध्य प्रदेश ने कुछ योजनाओं में आवंटित बजट का बेहतर उपयोग किया है, लेकिन मनरेगा और सामाजिक सहायता कार्यक्रमों में वित्तीय दबाव बना हुआ है। फंड की कमी के चलते कई जिलों में भुगतान और नए कार्यों की स्वीकृति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
MP में मनरेगा फंड खत्म
ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा आजीविका का अहम साधन है। फंड खत्म होने और बकाया राशि लंबित रहने से मजदूरों के भुगतान में देरी की स्थिति बन सकती है। कई जगहों पर पहले भी भुगतान अटकने की शिकायतें सामने आती रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द राशि जारी नहीं हुई तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।
अन्य योजनाओं में बेहतर प्रदर्शन
हालांकि मंत्रालय के जवाब में यह भी सामने आया कि राज्य ने कुछ अन्य ग्रामीण विकास योजनाओं में आवंटित बजट का प्रभावी उपयोग किया है। बुनियादी ढांचे और आवास संबंधी योजनाओं में प्रगति दर्ज की गई है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा और रोजगार गारंटी से जुड़ी योजनाओं में चुनौतियां बनी हुई हैं, जिन्हें दूर करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों और समय पर फंड रिलीज की आवश्यकता है।
आगे क्या?
राज्य सरकार और केंद्र के बीच बकाया राशि को लेकर समन्वय अहम होगा। यदि 704.64 करोड़ रुपये की देनदारी का जल्द निपटारा नहीं हुआ तो आगामी महीनों में मनरेगा के कार्यों की गति धीमी पड़ सकती है। फिलहाल राजनीतिक बयानबाजी के बीच असली सवाल यह है कि ग्रामीण मजदूरों और जरूरतमंद परिवारों को समय पर लाभ कैसे सुनिश्चित किया जाए।
