MP में आउटसोर्स और अस्थाई कर्मचारियों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इनका कहना है कि जब भी वे अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते हैं, सरकार पुलिस और प्रशासन का सहारा लेकर आंदोलन को दबाने की कोशिश करती है। आउटसोर्स अस्थाई अंशकालीन ग्राम पंचायत कर्मचारी संयुक्त मोर्चा ने साफ कहा है कि यह रवैया लोकतंत्र के खिलाफ है और बेहद निंदनीय है।
मोर्चा के अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने बताया कि 7 सितम्बर को भोपाल के नीलम पार्क में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन की योजना थी, लेकिन पुलिस प्रशासन ने इसकी अनुमति रद्द कर दी। शर्मा का कहना है कि सरकार गरीबों, मजदूरों और बेरोजगार युवाओं की आवाज दबाना चाहती है।
इतने लोग कार्यरत
प्रदेशभर में करीब 12 से 15 लाख अस्थाई, आउटसोर्स और अंशकालीन कर्मचारी काम कर रहे हैं। इनमें पंचायत चौकीदार, सफाई कर्मी, कार्यालय सहायक और अलग-अलग विभागों में लगे संविदा कर्मचारी शामिल हैं। इन लोगों को सालों से केवल 2 से 5 हजार रुपये मानदेय दिया जा रहा है, जो परिवार चलाने के लिए नाकाफी है।
मोर्चा का कहना है कि पंचायत राज व्यवस्था लागू हुए 31 साल हो गए, लेकिन आज तक पंचायत चौकीदारों और अन्य छोटे कर्मचारियों की सेवा-शर्तें तय नहीं हुईं। इससे कर्मचारी लगातार असुरक्षा और शोषण की स्थिति में काम करने को मजबूर हैं।
कर्मचारियों की मांग
- आउटसोर्स और अस्थाई कर्मचारियों का नियमितीकरण
- मानदेय की जगह सम्मानजनक वेतनमान
- ग्राम पंचायत चौकीदारों समेत सभी कर्मियों की सेवा-शर्तें तय हों
- सभी कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा लाभ जैसे ईपीएफ, पेंशन और स्वास्थ्य बीमा मिले
लगाया ये आरोप
मोर्चा के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. अमित सिंह ने कहा कि सरकार अस्थाई कर्मचारियों की एकजुटता से डर गई है। उनका आरोप है कि सरकार चाहती है गरीब कर्मचारी चुपचाप शोषण सहते रहें। उन्होंने कहा, “हम अब चुप नहीं बैठेंगे। प्रदेश के लाखों कर्मचारी न्यूनतम आजीविका की लड़ाई लड़ रहे हैं। ठेकेदार और पूंजीपति तो मजबूत हो रहे हैं, लेकिन कर्मचारी 2-3 हजार रुपये पर परिवार पालने को मजबूर हैं। यह अन्याय अब बर्दाश्त नहीं होगा।”
डॉ. सिंह ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने कर्मचारियों की जायज मांगों पर तुरंत कदम नहीं उठाया तो आंदोलन प्रदेशभर में फैल जाएगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी भाजपा सरकार की होगी।
