नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने पेयजल में सीवेज की मिलावट से जुड़ी गंभीर खबरों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकारों से जवाब तलब किया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि सामने आई मीडिया रिपोर्टें जनस्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बड़े खतरे की ओर इशारा करती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
एनजीटी ने इंदौर में दूषित पानी से मौत के मामलों और भोपाल के कुछ इलाकों में पेयजल में ई-कोलाई बैक्टीरिया मिलने का विशेष उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार, कई शहरों में जर्जर और दशकों पुरानी पाइप लाइन व्यवस्था के कारण सीवेज का पानी पेयजल आपूर्ति में मिल रहा है, जिससे आम लोगों की सेहत पर सीधा असर पड़ रहा है।
NGT सख्त
मीडिया रिपोर्ट में राजस्थान के उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बांसवाड़ा, जयपुर, अजमेर और बोरा जैसे शहरों का जिक्र किया गया है। तस्वीरों में पेयजल पाइप लाइनें खुले नालों और सीवेज लाइनों से होकर गुजरती दिखाई दीं। ट्रिब्यूनल ने माना कि ऐसी स्थिति गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करती है और तत्काल सुधार की जरूरत है।
एक अन्य रिपोर्ट में ग्रेटर नोएडा के सेक्टर डेल्टा-1 में सीवेज मिले पानी के सेवन से बच्चों समेत कई लोगों के बीमार होने की बात सामने आई। उल्टी-दस्त जैसे लक्षणों के बाद प्रशासन ने लीकेज की मरम्मत कर दवाइयां वितरित कीं, लेकिन स्थानीय लोगों ने इंदौर जैसी स्थिति दोहराने की आशंका जताई है।
एजेंसियों से जवाब
एनजीटी ने प्रथम दृष्टया पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के उल्लंघन की संभावना जताई है। न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने संबंधित राज्य सरकारों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालयों से जवाब मांगा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं।
पेड़ कटाई पर भी सख्ती
इसी सुनवाई में एनजीटी ने मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर हो रही पेड़ कटाई की खबरों पर भी स्वतः संज्ञान लिया। रिपोर्ट के मुताबिक, सड़कों, रेलवे लाइनों, कोयला ब्लॉकों और राष्ट्रीय राजमार्गों जैसी परियोजनाओं के लिए 15 लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं या काटे जाने प्रस्तावित हैं। इससे वायु गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ने की बात कही गई है।
9 मार्च को अगली सुनवाई
ट्रिब्यूनल ने सभी संबंधित पक्षों को शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च 2026 को होगी, जिसमें जिम्मेदारी तय करने और नागरिकों के सुरक्षित पेयजल के अधिकार पर विचार किया जाएगा।
