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RGPV में करोड़ों की गड़बड़ी का खुलासा, टैली डेटा पर पूरा भरोसा; लेजर तक नहीं बना

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Published On: 30 November 2025

राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) में वित्तीय अनियमितताओं का बड़ा मामला सामने आया है। ताजा ऑडिट रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले कुछ सालों तक जिन मदों में करोड़ों रुपए दिखाए जाते रहे, वे इस साल की रिपोर्ट में अचानक शून्य दिखाए गए हैं। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर शासन तक सबके कान खड़े हो गए हैं। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022-23 में आरजीपीवी की बैलेंस शीट में 1742.81 करोड़ रुपए दर्ज थे। साल 2023-24 की रिपोर्ट में यह रकम घटकर 1357.65 करोड़ रह गई। यानी करीब 385 करोड़ रुपए का कोई स्पष्ट विवरण मौजूद नहीं है। सवाल यह उठ रहा है कि इतनी बड़ी राशि कभी थी ही नहीं या फिर इसे किसी मिलीभगत से गायब कर दिया गया।

जांच में यह भी सामने आया कि जिन मदों में बड़ी रकम दर्ज होती रही कॉर्पस फंड, यूआईटी और यूआईटी सेल्फ फाइनेंस उनमें से कई को किसी अधिकारी ने कभी सत्यापित ही नहीं किया। पूरा वित्तीय रिकॉर्ड टैली डेटा पर चल रहा था और उसका लेजर तक तैयार नहीं किया गया। हैरानी की बात यह है कि विश्वविद्यालय के पास अपने सभी बैंक खातों की पूरी सूची भी उपलब्ध नहीं है।

कॉर्पस फंड तीन साल तक एक जैसा कैसे?

कॉर्पस फंड में 2020-21 से 2022-23 तक लगातार 425.72 करोड़ रुपए दर्ज किए गए थे। विशेषज्ञों के मुताबिक यह रकम हर साल ब्याज के साथ बदलनी चाहिए थी। लेकिन आंकड़ों में कोई बदलाव ही नहीं हुआ। इससे साफ है कि पिछले वर्षों की रिपोर्ट बिना सही दस्तावेजों के तैयार की गई और संदेहास्पद आंकड़े दिखाए गए।

जब विश्वविद्यालय ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए नया ऑडिटर नियुक्त किया, तब जाकर यह पूरा मामला खुला। नए ऑडिटर ने जब पुराने रिकॉर्ड से तुलना की, तो कई जगह राशि और दस्तावेजों में भारी अंतर मिला। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन भी मामले को लेकर गंभीर हो गया और शासन को इसकी जानकारी देने की प्रक्रिया शुरू की।

कॉर्पस फंड का खाता तक मौजूद नहीं

नई ऑडिट रिपोर्ट में यह बात आधिकारिक रूप से दर्ज की गई है कि विश्वविद्यालय ने कॉर्पस फंड के नाम पर कोई अलग खाता कभी बनाया ही नहीं। इसके बावजूद पिछले वर्षों की रिपोर्ट में इस मद के आगे करोड़ों रुपए दिखा दिए गए। एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि विश्वविद्यालय को मिली राशि को कई अलग-अलग खातों और एफडी में रखकर उनका रिकॉर्ड गायब कर दिया गया।

15 साल पुराना प्रस्ताव भी धूल झाड़ रहा

19 जनवरी 2005 को आरजीपीवी की वित्त समिति ने कॉर्पस फंड बनाने और उसके लिए नियम तय करने का प्रस्ताव पास किया था। लेकिन न तो नियम बने और न ही फंड का सही संचालन हुआ। बाद की ऑडिट रिपोर्टों में कॉर्पस फंड में दिखाई गई राशि को सीधे इन्वेस्टमेंट मान लिया गया, जबकि यह प्रक्रिया नियमों के विरुद्ध है।

मामला गंभीर

आरजीपीवी के रजिस्ट्रार प्रो. मोहन सेन ने कहा कि मामला बेहद संवेदनशील है और अभी विस्तृत टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। उन्होंने स्वीकार किया कि नई ऑडिट रिपोर्ट में पिछले वर्ष की तुलना में बड़ा अंतर सामने आया है। विश्वविद्यालय इस पूरे प्रकरण की जानकारी राज्य शासन को दे रहा है।

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